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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अपराध नहीं, जैसी उनकी बुद्धि है वैसेही बनाते और करते हैं । विद्याभिमानियोंको अंतरीय प्रकाश कभी नहीं होती, फकीरोंको अंतर प्रकाश मिलता है, उससे वे लोग जो कुछ जानते हैं उसे दूसरेसे नहीं प्रगट कर सकते ।

अंतरीय प्रकाश, बिना सच्चे संत और सच्चे गुरुको कदापि नहीं मिल सकता । यही कारण है कि, सच्चे संत और विद्याभिमानी तथा संसारको चाहनेवाले ढोंगियोंमें सदासे भेद चला आता है । सच्चे संत और सच्चे साधु, ढोंगियों और मिथ्या विद्याभिमानियोंको ढोंग पाखण्ड और मिथ्या अभिमान छोड़नेको कहते हैं। तब वे कहते हैं कि, मुझे प्रत्यक्ष कुछ लाभ दिखलाओ। वो बात होनेवाली नहीं क्योंकि, सत्य विचार और निर्णयके बिना अंतरीय प्रकाश, नहीं मिल सकता । जो सर्वदा सांसारिक व्यवहार और विषयवासनामें फँसा रहेगा उसको प्रकाश कहाँसे मिले ? जो सच्चा ईसाई हो इनजीलके अनुसार कर्म करे तनिक भी विभिन्नता न होने दे तबही ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर सकता है ।

ईसाइयोंने साधुओंकी निन्दा करनी आरम्भ करदी। संत लोग इनसे अलग हो गये । संतोंके अलग होनेसे गुरु कहाँ रह सकते हैं ? गुरुही नहीं रहे तो पथ कौन बतावे ? इस समयमें इस धर्मके लोग साधुओंके स्थानमें पादरियोंको मानते हैं । सर्व प्रकारके शुभ कर्म करते हैं पर वह बात नहीं कि, जो सन्तोंके उपदेशसे मिलता है। क्योंकि, जब संसारीका गुरु संसारी हुआ तो; जैसे कीचसे कीचके धोनेसे शुद्धता नहीं होती उसी तरह गृहस्थी गुरुसे किसी प्रकार कल्याण नहीं हो सकता जबतक अवधूत, विरक्त, गुरु और आचार्य न मिलेगा तब तक कल्याण होना असम्भव है, जब गुरु विरक्त होगा तब भी सत्यके प्रकाश का मार्ग बतावेगा । इस धर्ममें रोजा निमाजकी कुछ भी ताकीद नहीं है यही कारण है कि, इस धर्मके लोग इन्द्रिय दमन नहीं कर सकते । इसमें बड़े २ विद्वान्, बुद्धिमान और शूरवीर लोग हैं इनके पास द्रव्य उपार्जनकी जैसी युक्ति है वैसे संसारकी किसी भी जातिमें न होगी । पर धार्मिक विचारमें ऐसे कच्चे हैं कि, उनके बराबर धर्ममें, पीछे संसारकी छोटीसे छोटी जाति भी नहीं है ।

सुना गया है कि, थोड़े दिनोंसे मेजर टकर साहब नामक किसी अंगरेजने मुक्ति फौज नामक एक मण्डली बनाई है, जिसमें सबके सब साधुओंके भेषमें रहते हैं, मन और इन्द्रिय दमन भी करते हैं । शायद वे लोग इनजील से उस वचनका कुछ आशय समझते होंगे कि:—

हजरत ईसाने किस लिये कहा कि, जो कोई अपना सलीब उठावे अपनेको भूल जावे, वह मेरे पीछे आवे प्रतिदिन सलीब उठावे । जिसने बाइबुलकी इस बातका आशय समझ लिया वही सच्चा ईसाई हुआ ।