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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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“पैठा है घट भीतरे, वैठा है साचेत ।

जब जैसी गति चाहता, तब तैसी मति देत ॥”

जैसे बकरी कसाईसे प्रेम करती है और उसके पास स्वेच्छापूर्वक दौड़ दौड़कर जाती और अपना गला कटाती है, ऐसेही समस्त मनुष्य परसमवेदकी शिक्षा ग्रहण करके धर्मराजका भोजन बनते हैं, इस काल पुरुषका मुंह अग्नि है जैसा कि, विराट् स्वरूपमें लिखा है । इसी लिये जो वेदमंत्रोंके साथ अग्निमें हवन किया जाता है सो सब इस अलख निरञ्जनका भोजन होता है, इसीकारण अश्वमेध, गोमेध, नरमेध, अजमेध इत्यादि यज्ञ परम्परासे होते आते हैं ।

कबीर साहबके ग्रंथ अनुरागसागरमें देखो कि, आकाशमें एक तप्त-शिला है, उसी तप्तशिला पर सब जीव जलते बलते और तड़प २ कर कबाब होते हैं और उन सबको काल पुरुष खाजाता है, इस प्रकार अद्या तथा निरञ्जन सब जीवोंको मारमार कर खाया करते हैं । अत्यन्त दुःखपानेपर सब जीव तड़प तड़प कर हाय हाय करते और पुकारते हैं कि, हे दीनबयालु ! सबके पालनकर्त्ता ! हमको धर्मराज अत्यंत कष्ट दे रहा है आकर इससे बचाओ और हमारा दुःख क्लेश हरण करो ।

उनचालीसवाँ प्रकरण

भवसागरका स्वरूप ।

यह अद्या तथा निरञ्जन दोनों पति पत्नी लोक तथा वेद रूपी भवसागरके दोनों किनारोंपर जीवोंको रोकनेके लिये अत्यंत सावधानीपूर्वक बँठे हुए हैं और इस भवसागरके बीचमें तीन अहेरी कर्माँका जाल लिये फिरते हैं—ये सहस्रों पंथ प्रचलित करके, एक दूसरेके विपरीत राह दिखा, स्वपक्षमें फँसाकर मनुष्यमात्रको अंधा करते हैं—जिससे समस्त मनुष्य अज्ञानता वश भटक भटक कर मरते हैं । किसीको भी मुक्तिका मार्ग मालूम नहीं होता । ये तीनों मछुवे ऐसे बलिष्ठ हैं कि, अपने अनन्त कपट जालों द्वारा जीवोंको फँसाही लेते हैं और भौति भौतिके कर्म व उपासना योग तथा ज्ञान द्वारा, लोभ लालच बतलाकर किसीको अपने जालसे बाहर जाने नहीं देते और अज्ञानवश समस्त मनुष्य आपसे आप आ आकर स्वयम् कँव हो इन पांचों शिकारियोंका आखेट बनते हैं । इस भवसागरमें समस्त जीव मछलियोंके सदृश हैं और ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों मछुवे इस समुद्रमें गर्जते फिरते हैं, कोई इनका सामना कर नहीं