कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसकता । यदि ऋषियोंमेंसे कोई इनके सामने खड़ा होवे तो सहस्रों प्रकारकी धूर्ततासे उनको भी वशीभूत कर लेते हैं । जहाँ कहीं ये तीनों दबते हैं त्रह्राँ तुरन्त उनको माता पिता उनकी सहायता करते हैं और उनको बल देकर उनकी कामना पूरी करते हैं, ये पाँचों बड़े भयानक तथा मनुष्योंके कष्टदाता हैं —
पचासवाँ प्रकरण
दुःखित जीवोंकी पुकार और सत्यपुरुषकी गोहार ।
सब जीवोंने अनन्त कालपर्यंत बड़ा दुःख पाया, उन्हें कुछ सूझताही नहीं था कि, क्या करें और किस उपाय द्वारा बचें ! इससे अत्यन्त दुःखी होकर ऐसे चिल्लाते हाय हाय करते थे कि, उनके रोने तड़पने तथा चिल्लानेका शब्द सत्यलोकपर्यंत जा पहुँचा ।
जब सब जीवोंके हृदयका धुवों सत्यलोकपर्यंत पहुँचा तब सत्य पुरुष दयालु हुए और दया करके ज्ञानीजीसे कहा कि, हे ज्ञानी ! सब जीवोंको काल-पुरुष अत्यंत दुःख दे रहा है, तुम तप्तशिलातक जाओ और सबको ठंढा करो ।
इकावनवाँ प्रकरण
ज्ञानीजी अर्थात् कबीर साहबका सत्यलोकसे तप्तशिलाके समीप जाना और समस्त जीवोंके ठंढा करनेका वृत्तान्त ।
सत्य पुरुषकी आज्ञा पातेही ज्ञानीजीने तप्तशिलाके समीप पहुँच कर सत्य शब्दकी टेर की । सत्यशब्दकी आवाज सुनतेही सारे जीव ठंढ होगये, जब सारे जीवोंको विश्राम मिला तब सत्यगुरुको पहचाना और जान लिया कि, यही दयालु हमारे ऊपर दया करने आया है इसीने हमको बचाया तथा ठंढा किया है ।
शेर
दोस्त खलायक अवदो अजलके । मूझजने रहमो करमो फजलके ॥
पाक खुदाबन्द जो परवरदिगार । आदमके सूरत हुआ आशंकार ॥
आपही अपना जो ले आया पयाम । पाक नबीका है मुकद्दस कलाम ॥
लेके जो पैगाम चले लोकसे । तप्तशिला देख जले झोकसे ॥
देखा वहाँ आन जो सोजान संग । जलते तड़पते जीव जहाँ जैसे ढङ्ग ॥
कहके शब्द सत पुकारा जहाँ । सदै हुई फौर सो आतिश वहाँ ॥