Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 117 of 1367

Read in context
Page 117

किताब देते हैं। निरञ्जन तथा अद्याने सत्य पुरुषका नाम समस्त संसारसे छिपा दिया और मुक्तिमार्गके समस्त द्वारोंको रोक लिया। इस कारण कि, कोई भी मनुष्य मुक्तिमार्ग न पावे, सदा आवागमनके जालमें फँसा रहे और भवसागरमें डुबकियाँ खाया करें तथा सब कालपुरुषके भोजन बनें।

इस प्रकार चारखान चौरासी लाख योनिके जीव अर्थात् समस्त माया-सृष्टि कालपुरुषके चंगुलमें फँस गयी और उसके जालसे उनका छुटकारा कठिन हो गया। यह धर्मराज निरंजन नित्य एक लाख जीवको तपत्शिलापर भून भून कर खाया करता है। इस प्रकार सब जीवधारी सांसारिक आपत्ति-जालमें फँस गये ॥

अडतालीसवाँ प्रकरण

तपत्शिलाका वृत्तान्त ।

भवसागर एक विशाल समुद्र है, जिसके दो किनारे हैं, एक लोक, दूसरा वेद। इस लोकके किनारेपर आदि भवानी बैठी है और उसके साथ चौसठलाख जोगिनियाँ रहतीं और समस्त संसारमें धूम मचाती हैं। ये हाथोंमें खप्पर लिये सब जीवोंका रक्तपान करती फिरती हैं। जहाँ भवानीके स्थान हैं वहाँ मनुष्य, भैंसा, बकरा, मुरगा, आदि प्रत्यक्ष काटे जाते हैं, वे सब इन देवियोंके भोजन होते हैं। इन्हींके लिये बेधडक अत्यंत निर्दयताके साथ नित्य अनन्त जीवोंका बलिप्रदान होता है। ये बलवती देवियों समस्त पृथ्वी तथा आकाशमें घूमा करती हैं।

पृथ्वीसे छत्तीस सहस्र योजन पर (जिसको कबीर साहबने सालोक-सक्ति कहा है) स्वयम् मायाका स्थान है, वहाँसे अद्या अपनी फौज सहित अथवा अकेली सप्तद्वीप नौखंडमें फिरा करती है और समस्त संसारमें राज्य करती है।

यह अद्या तो लोकके किनारेपर बैठी है और दूसरा जो वेदका किनारा है, उसके ऊपर निरञ्जन देवता अत्यंत सचेत तथा चैतन्य होकर बैठा, ऐसा मंत्र पढ़ रहा है कि, जिसमें उसके मंत्रके प्रभावसे कोई जीव तीनों लोकके बाहर न जा सके। वही सब जीवोंकी बुद्धिपर बैठा है और जिधरको चाहता है मनुष्योंकी बुद्धिको उधर को फेर देता है और किसीको सत्यपुरुषकी भक्तिकी ओर ध्यान देने नहीं देता है —