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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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६ स्थितिकी सात शाखायें—(ह्रीं) अथवा (म) स्थितिका बीज है। १ अन्न, २ पानी, ३ घास आदि, ४ मिट्ठी, ५ पत्ती, ६ फूल, फल आदि।

७ नाशकी सात शाखायें—क्लीं—अथवा हूँ—यह नाशका बीज है, इनसे सात शायायें निकली हैं। वह ये हैं—१ पृथिवी, २ जल, ३ वायु, ४ अग्नि, ५ पग, ६ हाथ, दांत। इसके अतिरिक्त नाशके लिये सहस्रों प्रकारके हथियार बने हैं, सो सब इन्हींके अन्तर्गत हैं।

जीवका भ्रम।

जीवने अपने सत्यरूपसे गिरकर इन्हीं सात शाखाओंमें बासा लिया। इन्हींके वशमें पड़ा हुआ बारम्बार जन्म मृत्युको प्राप्त होता है, कहीं सुख नहीं मिलता। यद्यपि यह बहुत युक्तियाँ करता है पर इसके छूटनेकी आशा नहीं होती, जिस गुरु अथवा आचार्यके निकट जाता है, वेही अपने स्वार्थ और मान बड़ाईके वश होकर नाना प्रकारकी रीति रसम और पाखण्डोंमें फँसाकर अपने आधीन करनेकी इच्छा करते हैं पर अज्ञानियोंको कुछ भी सुधि नहीं होती कि, मुक्ति किसे कहते हैं? और बन्धन किसको है?

भवसागरमें जितने लोग अपनेको ज्ञानी और ध्यानी समझते हैं, जीवन्मुक्त मान रहे हैं, विदेह मुक्तिकी आशा रखते हैं वे सब मिथ्या भ्रममें पड़े हैं। वे लोग जिनको जीवन्मुक्त कहते हैं वे कर्मोंके पाशमें बँधे बारम्बार भगवत्सागरमें फेरा खाया करते हैं। यदि एक दरिद्रीका नाम राजा रख दिया जावे तो क्या वह इससे यह राजा हो सकता है? उसकी दरिद्रता नष्ट हो सकती है।? कदापि नहीं। वह नाममात्रको राजा कहलाता है, यथार्थमें नहीं कहला सकता। इसी-प्रकार वेदने जिनको जीवन्मुक्त बतलाया है वे सब जीवन्बन्ध हैं, जीवन्मुक्त कोई नहीं। वे सब कर्मके रहटमें पड़े हुये हैं; जैसे रहटमें बरतन भरके नीचेसे ऊपरको आता है ऊपर आके फिर नीचेको जाता है, इसी प्रकार यह जीव भी कर्मोंसे ईश्वर पदको प्राप्त करता है, नीचे पड़के नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकता है। इन सात शाखाओंमें पड़ा हुआ पुरुष छूटनेका मार्ग भी नहीं पाता।

संसारके जीवधारी इन्हीं सप्त शाखाओंमें पड़े हुये बारम्बार आवागमन करते हैं। यही कालपुरुषका पंजा है जिसमें पड़े हुये जीवका छूटना दुस्तर है।

सर्व मत मतान्तरको जो ऋषि मुनि जीवन मुक्ति और विदेह मुक्तिकी कथा किया करते हैं। उनकी जीवन मुक्ति हुमा पक्षीके समान है। जिसको न किसीने कभी देखा, न उनका निवास स्थान ही जानते हैं, जो कि, जाकर देख लें, केवल लोगोंकी बनावट और कल्पनाकी ही बातें हैं।