कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकबीर साहब सर्वदाससे कहते चले आते हैं कि; किताबोंके द्वारा न किसीकी मुक्ति हुई है न होगी, न इन नाना प्रकारके मतोंके गुरुवा लोकोंके उपदेशसे कोई बन्धनसे छूटा है, न छूटेगा ।
कितने पक्षपाती धर्मद्वेषी नानाप्रकारकी युक्ति और प्रमाणसे सिद्ध करना चाहते हैं कि, अधिकारी लोग विशेष कारणोंसे प्रगट होते हैं पर विचार-नेकी बात है कि, जबतक सांसारिक कामना न हो तो आवागमनमें आनेकी क्या आवश्यकता है ? । कोई किसी प्रकारकी युक्ति, तप आदि क्यों न करे पर जबतक सत्य गुरुकी कृपा न होगी तबतक वासनासे निवृत्त नहीं हो सकता ।
गर्भमें आनेका कारण, मुख्य करके पूर्व जन्मका पाप है । क्योंकि, गर्भ पूर्ण नर्क है । जबतक गर्भमें जाना आना लगा है तबतक ज्ञानी अज्ञानीमें किसी प्रकारका भेद नहीं है । कोई थोड़े दिनोंके लिये, राजा बन गया, कोई दरिद्री रहा तो इससे क्या हुआ ? कोई ज्ञानी हुआ कोई अज्ञानी, किसीको थोड़ी विद्या हुई, किसीको उससे अधिक पर जबतक आवागमनका भ्रम न छूटा तबतक उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ सब बराबर हैं ।
कैवल्य शरीरसे लेकर स्थूल देह तक सभी नाशमान हैं निर्मूल हैं, किसी में अंधकार है, किसीमें प्रकाश, किसीमें थोड़ा ज्ञान है, किसीमें बहुत, किसीमें थोड़ी सामर्थी है, किसीमें बहुत, कोई थोड़े दिन जीता है कोई दीर्घायु होता है । क्या हुआ ? कैसे ही पदको प्राप्त हो पर जबतक इन पांच देहोंके अहंकारसे न छूटेगा तबतक सुखको न प्राप्त करेगा ।
ये पांचों अहंकार काल पुरुषके हैं । इन्हीं द्वारा बिधि निषेध दोनों कर्मके भेद बनाये हैं । इसके भेदको हंस कबीरके बिना दूसरा कोई नहीं जान सकता, जो जीव गर्भमें आते हैं वे सब काल पुरुषके कैंदी हैं । निष्पाप कोई कभी कैंद नहीं हो सकता, जो कैंदी होता है उसका कुछ न कुछ अपराध होता है । निर-पराध कभी भी बन्धनमें नहीं आ सकता ।
केवल अपराधियोंके लिये ही कारागार बनाया गया है । न्यायी प्रभु कभी किसीको बिना अपराध दण्ड नहीं दे सकता । उसके जितने कार्य हैं सब न्याय संयुक्त हैं । जो अपराधी होता है वह जेलखानेके दारोगाके आधीन किया जाता है यह उसको जंजीरोंमें बांधकर जेल खाने (कारागार) में कैंद कर देता है । ये तीनलोक काराग्रह हैं धर्मराय इस जेलखानेका अधिपति है । तो अपराधियोंको कर्मरूप जंजीरसे बांधकर मातृ गर्भमें डाल देता है । वहाँ पर जीव हाय २ करता है, पुकारता है कि, हे प्रभो ! मुझ दोनको इस दुःखसे छुड़ा, मैं