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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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यजन—इसलोककी, याजन—पर लोककी, अध्ययन—विद्याभ्यास करना, अध्यापन—अभ्यास कराना, दान देना, प्रतिग्रह (संग्रह करना—अर्थात् दान लेना) और मैथुन कर्मोंकी यही सात शाखायें हैं ।

२ उपासनाकी सात शाखायें—इ—अर्थात् श्री बीज—१ शिव, २ विष्णु, ३ गणपति, ४ सूर्य, ५ शक्ति ६ राम, ७ कृष्ण ये शाखायें हैं, इनके सात करोड़ महामंत्र हैं । जारण, मारण, वशीकरण, उन्मत्तता, आकर्षण स्तम्भन मोहन येही फल हैं ।

३ योगकी सात शाखायें—इसका बीज रं है, १ हठयोग, २ कुण्डलिनी योग, ३ लम्बिका योग, ४ तारक योग, ५ लय योग, ६ अमनस्क योग, ७ साङ्ख्य योगये शाखायें हैं । समाधि फूल और सिद्धि फल है ।

४ ज्ञानकी सात शाखायें—सोहं बीजका ज्ञान अंकुर है उसकी सात शाखायें हैं—२ शुभइच्छा, २-स्वविचार, ३-तनुमानसा, ४ सत्त्वापत्ति, ५ असंशक्ति, ६-पदार्थाभाविनी, ७ तुरिया । परोक्ष ज्ञान फूल है । अपरोक्ष ज्ञान फल है ।

५ उत्पत्तिकी सात शाखायें—ऐं बीज है, उत्पत्ति अङ्कुर है, उसकी सात शाखा हैं—१ शब्द, २ स्पर्श, ३ रूप, ४ रस, ५ गन्ध, ६ इच्छा और ७ वासना ।

शब्द—बादलके गरजनसे और नाना प्रकारके शब्दोंसे कीड़े, मकोड़े और मँढक, जोंक आदि उत्पन्न होते हैं ।

(२) स्पर्श—मैथुनसे जो जीव उत्पन्न होते हैं ।

(३) रूप—अनल पक्षी आदिक बहुतसे जीवधारी केवल दृष्टिसे उत्पन्न होते हैं, वे सब रूप सृष्टि कहलाते हैं ।

(४) रस—इससे समस्त जलके जीवोंकी उत्पत्ति है, वृक्षोंके फलके कीड़ोंकी उत्पत्ति भी इससे ही होती है ।

(५) गन्ध—इससे उषमज योनिकी उत्पत्ति होती है ।

(६) इच्छा सिद्धि योनि है—योगेश्वर लोग अपनी इच्छासे चाहें जैसा स्वरूप धारण करलें जहाँ चाहें चले जाय, एकका अनेक स्वरूप बना लें, लघु दीर्घ आदिक हो जावें, इसीको सिद्धि योनि कहते हैं ।

(७) वासना—वासनासे देवता भूत प्रेतादिककी देह बनती है, यही सात प्रकारकी उत्पत्ति है । स्त्री फूल है । पुरुष फल है ।