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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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योगमें सग्न रहता है, कोई षट्कर्म करता है कोई षट्चक्र वेधकर त्रिकुटीमें ध्यान लगाता है, सहस्रदल कमलमें जा समाता है ।

तप और भजनकी बहुतसी रीतियाँ हैं, उनका कौन बयान कर सकता है ? सब मतोंके साधु जो दुःख कष्ट भजनमें उठाते हैं, उससे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो अनन्त सूर्यके समान प्रकाशमान हो जाता है, त्रिकालज्ञ हो जाते हैं, गुप्त सब भेद प्रगट हो जाते हैं । ऐसे पुण्यरूप महात्माओंको प्राकृतिक लोग दुःख कष्ट देते हैं । उनकी निन्दा करते हुए गालियाँ सुनाते हैं । वे महात्मा सब दुःखोंको धैर्यके साथ सह लेते हैं, कभी क्रोध नहीं करते, मूर्ख लोग दो चार पुस्तकें अथवा इधर उधरकी दो चार बातें, दो चार भजन साखी शब्द सीखकर उनसे बाद विवाद करके दुःख देनेका प्रयत्न करते हैं । इसपर एक दृष्टान्त लिखता हूँ ।

सिद्ध महात्मा और विद्याभिमानी—एक नगरमें फिरते २ एक साधु आये । बहुतसे नगरवासी उनके दर्शन करनेको आने लगे, उन लोगोंके साथ एक युवक विद्याभिमानी ब्राह्मण भी आया । अपनी विद्याके अभिमानसे साधुके साथ, वाद विवाद करने लगा । उसने कहा मेरे साथ शास्त्रार्थ करो । तब उसने कहा कि, तुम कहाँसे आये हो ? ब्राह्मणने उत्तर दिया—मैं इसी नगरसे आया हूँ । साधूने कहा, इसके प्रथम कहाँसे आये ? उसने उत्तर दिया कि, मेरा जन्म तो इसी नगरका है । सन्तने कहा तुम्हें कुछ सुधि नहीं । तुम पहले जन्म गीदड़ थे अब ब्राह्मणके शरीरमें आये हो जब तुम गीदड़ थे उस समय वर्षा होनेके कारण किसी कुम्हारके घरमें जा छिपे, वह किसी नाजके खानेसे तुम्हारा पेट फूल गया तुम मर गये कुम्हारने तुम्हें अपना हानिकारक जानकर खाल खींच ली वह खाल अभी तक उसके घरमें लटक रही है वह कुम्हार भी जीवित है ।

इतना सुनकर कितनेक लोगोंने कुम्हारके घर जाकर देखा तो साधुके वचनमें तनिक भी विभिन्नता न पाई । इस बातसे उस ब्राह्मण पुत्रको बड़ी लज्जा आई अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग होते देख मनमें निश्चय कर लिया कि इस साधुका शिर अवश्य ही काट लूंगा । अर्द्धरात्रि होने पर एक तलवार ले नगरके बाहर उजाड़में पहुँचा जहाँ कि साधु ठहरा हुआ था । साधुके निकट पहुँचकर साधुको मारनेको ज्योंही तलवार उठाई त्योंही हाथ उठाये हुये पत्थरके समान रह गया । उसी प्रकार खड़े खड़े सबेरा हो गया । लोग साधुके दरशनको आने लगे लोगोंने देखा कि, वह ब्राह्मण पुत्र साधुके शिरपर नङ्गी तलवार लिये खड़ा है । यह देखकर बहुत आश्चर्यमें हुये ब्राह्मणपुत्रको बुलाने लगे पर वह न बोल सका ।