कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextफिर सबने साधुसे कहा कि महाराज ! अपराध क्षमा करो । तब साधूने कहा कि, मैंने न तो इसपर क्रोध किया, न शाप दिया, न इसका कुछ बुरा चाहा । लोगोंने बहुत विन्ती की तो साधूने उच्चस्वरसे पुकार कर कहा कि, मैंने तो इस ब्राह्मण पुत्रको कुछ दुःख नहीं दिया, यदि किसी देवताने इसको कील दिया हो तो अब छोड़ दो इसका अपराध क्षमा करें । इसपर आकाशवाणी हुई कि । साधुके कहनेसे मैं इस ब्राह्मणपुत्रको छोड़ता हूँ । नहीं तो इसको यहाँही पुखाकर मार डालता । ये केवल साधुके रक्षक देवताने जब ऐसा कहा तो ब्राह्मण पुत्रका बन्धन छूट गया । सचेत होकर साधुके चरणोंपर पड़ा उसका शिष्य हो गया । लोग साधुको धन्य धन्य करने लगे ।
मूर्खलोग सन्तोंकी बहुत निन्दा और ठट्ठा किया करते हैं पर सच्चे सन्त अपने भजन भक्तीको नहीं छोड़ते ईश्वरकी कृपा का भरोसा रख कर भजन करतेही रहते हैं । कुर्तोंके भूँकनेसे सन्तोंके भाग्यमें घटी नहीं होती, जिस विश्वम्भर ने मातृगर्भमें पालन किया, माताके स्तनोंमें दूध भर दिया, उस पर विश्वास करना ही योग्य है ।
विश्वास अङ्गकी साखी ।
कबीर - भू भूख तू क्या करे, कहा सुनावे लोग ।
भांडा गढ़ जिन मुख दिया, सोई भरने योग ॥
कबीर - रचनहारको चीन्हले, खाने को कहैं रोय ।
दिल मंदिरमें बैठिके, तान पछौरा सोय ॥
कबीर - सिर्जनहारा सिर्जिया, आंटा पानी लौन ।
देनेहारा देत है, मेटनहारा, कौन ॥
कबीर - चिता मतकर अर्चित रह, देनहार समरथ ।
पशूपखेरू जीव सब, तिनके गांठ न ग्रथ्य ॥
कबीर - अण्डा पाले काछुई, थन बिन राखे पोक ।
यों करता सब्रको करे, पाले तीनों लोक ॥
कबीर - जाके मन विश्वास है, सदा गुरु तेहि सङ्ग ।
कोटि काल झकझोरही, तऊ न होय चित भङ्ग ॥
कबीर - घटमें ज्योति अनूप है, रिज्ज मौत जिव साथ ॥
कहा सार है मनुष्यकी, कलम् धनीके हाथ ॥
कबीर - जाके दिलमें हरि बसे, सो जन कलपे काहि ॥
एकै लहर समुद्रकी, दुख दरिद्र सब जाहि ॥