कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextझूठे हुये । हजरत ईसाने अपनी अन्तरदृष्टिसे देखकर लोगोंसे कहा कि, उस धोबीकी गठरी खोलो । लोगोंने गठरी खोली तो उनमेंसे एक बड़ा विषैला सॉप निकल पड़ा । हजरत ईसाने लोगोंसे कहा कि, यदि यह विषैला सॉप धोबीको काट लेता तो यह धोबी शीघ्रही मर जाता । जिस समय मैंने लोगोंसे कहा था कि, धोबी घाट परसे जीवित नहीं आवेगा, उसी समय सॉपको आज्ञा हुई थी कि इसको काटले, किन्तु धोबीने उस समय ऐसी उदारता और पुण्य किया कि, जिसके कारण इसके प्राण बच गये इसने अपने खानेकी रोटी एक कामिल फकीर पूर्ण महात्माको देदी । इसने पहली रोटी दी थी, तो फकीरने इसके अन्तःकरण शुद्ध होनेका आशीर्वाद दिया था । दूसरी रोटी फकीरने पाई थी तब कहा था कि, तुझे ईश्वर अचानक आपत्तियोंसे बचावे, फकीरने इतना कहा उसी समय सॉपके मुंहपर मुहर लग गई । सॉप काट नहीं सका । फकीरने तीसरी रोटी खाकर उसे स्वर्गमें स्थान मिलनेका आशीर्वाद दिया अब उस धोबीका अन्तःकरण शुद्ध हो गया, वह किसी प्रकारकी दुष्टता न करेगा । वह स्वर्गीय होगया है इस कारण, नरकियोंके समान दुष्ट व्यवहार न करेगा । उसी समय धोबी शुद्ध अन्तःकरण हो सदाचारी बन गया । फकीरको केवल तीन रोटी देनेसे धोबी मृत्युके मुखसे निकल कर स्वर्गका भागी हुआ ।
लंगोटी देनेसे चीर बढ़ा—महाराणी द्रौपदीने दुर्वासा ऋषिको एक लंगोटीदी थी, जिसके कारण उनका बस्त्र इतना बढ़ा कि, दुःशासन जैसा पहलवान भी खींचते २ थक गया, कपड़ोंका ढेर लग गया पर वह कम नहीं हुआ और महारानीकी प्रतिष्ठा रह गई ।
सहन शीलता और धैर्य ।
साधु लोग जो दुःख उठाते हैं, उनका वर्णन कौन कर सकता है ? देखो ग्रीष्म ऋतुमें जब कठिन धूप पड़ती है, उस समय पाँच अथवा चौरासी धुनी लगाकर तापते हैं । ऊपरसे सूर्यकी गरमी, नीचेसे पृथिवीकी तपन, चारों ओरसे अग्नीकी लू लगती है पर वे दृढ़ होते हैं कि, उससे तब तक हटना नहीं जानते जब तक कि, अग्नी न बुझ जावे । इसी प्रकार शरद कालमें जब कि, शर्दीके मारे दांतोंसे दांत बजते हैं उस समय पानीमें घुस जाते हैं । माघ पौषके महीनेमें पानीमें नङ्गे बैठे रहते हैं । प्राण जायें तो जायें पर अपनी टेकको नहीं छोड़ते । कोई उलटा लटक कर अग्निझप लेता है, कड़कड़ोंपर लेटा रहता है, कोई बाण शय्या बनाकर सोता है, कोई मौन धारण करता है, कोई ठाढ़ेश्वरी बनता है, कोई दिन रात एक पगसे खड़ा होकर भजन करता है, कोई प्राणायाम और