कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context“ब्रह्मा मोर दरस नहिं पाया । झूठसाख इन आन दिखाया ॥
तीनों मिथ्या कहें बनायी । जनि मानहु यह है लबरायी ॥
(अनुरागसागर)
जब इस प्रकार कालनिरञ्जनसे पूछकर अध्याने मालूम कर लिया कि, ये तीनों झूठ बोलते हैं। तब वह अत्यंत क्रुद्ध होकर पहले ब्रह्माकी ओर मुड़ी और कहने लगी, हे ब्रह्मा ! तू झूठा है और झूठकी खान है—इस कारण तेरी पूजा संसारसे उठ जावेगी और तेरी संतति द्वार २ पर ठोकरें खायेगी तथा जैसा तू झूठा है वैसीही तेरी सन्तान भी झूठी होगी। स्वार्थ सिद्ध करनेके निमित्त सदा झूठ बोलेंगी, निज स्वार्थके निमित्त कथा पुराण सुनावेगी, परमार्थके निमित्त नहीं, दूसरे मनुष्य जो उसके कथा के श्रोता होंगे उनके मनमें तो ज्ञान तथा वैराग्य उत्पन्न होगा, पर वह स्वयं इससे बञ्चित रहेंगी उसके हृदयोंपर कालिमा छायी रहेगी, उसके मनमें भक्ति कभी नहिं उपजेगी—देखो, अनुरागसागर।
यह सुनि माता कीन्हीं दापा । ब्रह्माको तब दीन्ही शापा ॥
पूजा तोर करै कोउ नाही । जो मिथ्या बोल्यो मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिरलीन्हा ॥
आगे होइहै जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रकट करहि बहुनेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्त सो करिहै हंकारा । ताते परि है नरक मँझारा ॥
कथा पुरान औरिहैं समुझैं हैं । चाल विहून आपन दुख पैहैं ॥
उनते और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहैं परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल घर जैहैं ॥
जाकहैं शिष्य करैं पुनि जायी । परमारथ तेहि नाहि लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार्थ अर्थ सवैं समुझहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिढैहैं ॥
आप ऊँच औरिहै कह छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥
(अनुराग सागर)
इस प्रकार ब्रह्माको शाप देकर तब्र अद्या गायत्रीकी ओर फिरी और कहा कि, हे गायत्री ! तूने जो मिथ्या साक्षी दी उससे चार पैर की गाय हो जावेगी और तेरे अनेक पति होंगे—तथा तू विष्ठा और निषिद्ध वस्तुओंको खाती फिरेगी। फिर अद्या पुष्पावतीकी ओर फिरी और कहने लगी कि, हे पुष्पावती ! तू जो ऐसा झूठ बोली इससे तू जाकर पृथ्वी पर पुष्प बनेगी और केवडा