कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextतथा केतकी तेरा नाम होगा, लोग तुझको गंदे स्थानमें लगावेंगे—और जो कोई तुझको लगावेगा वह निर्बंश होगा ।
चोतीसवाँ प्रकरण
निरंजनका अद्याको शाप देना ।
इस प्रकार अद्याने तीनोंको शाप तो दिया किन्तु फिर अपने मनमें चिंता करने लगी, कि, मैंने तीनोंको शाप देकर आपत्तिमें फँसाया । मैंने तनिकभी धीरज नहीं रखा । ये तीनों दुःखी हो गये । इस कारण न जाने निरञ्जन मुझको क्या कहेगा ? यह बात अद्या अपने मनमें सोच रही थी कि, निरञ्जनकी ओर से आकाशवाणी हुई कि, “हे भवानी ! मैंने तुझको सृष्टिके फैलाव करनेके निमित्त नियुक्त किया था, उसके विपरीत तूने किया—अर्थात् इन तीनोंको शाप देकर दुःखी कर दिया, सो जो कोई बलवान किसी निर्बलको दुःख देगा या सतायेगा तो मैं उसका परिशोध करूँगा । किसीका बदला कदापि नहीं छोड़ूँगा । सो तूने जो इन तीनोंको शाप दिया है—इस कारण जब द्वापरयुग आवेगा तब तेरा अवतार होगा और तेरे पाँच पति होंगे और तू भी दुःख पावेगी । सो द्वापरमें अद्याका द्रौपदीका अवतार हुआ । जब इसप्रकार निरञ्जनने अद्याको शाप दिया—तब आकाशवाणी सुनकर बड़ेही दुःखसे वह विलाप करने लगी और कहने लगी कि, हे निरञ्जन ! मैं तेरे वशमें हूँ तेरे मनमें आवे सो कर ।
पैंतीसवाँ प्रकरण
विष्णुका पिताके दर्शनको जाना, गौरसे श्याम होना और तीन लोकका राज्य पाना ।
फिर भवानी विष्णुके समीप गयी और उससे कहा कि, तुमभी जाओ और पिताका दर्शन करो और उसके दर्शनका हाल मुझसे कहो । तब विष्णु पाताल लोकको चले, जाते २ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ शेषनाग थे, शेषनामकी फुँफकारके विषसे विष्णु अचेत हो गये और उसी विषके प्रभावसे विष्णुका रङ्ग बदल गया नहीं तो उसके पूर्व उनका रंग गोरा था, सो नीला आसमानी रङ्ग हो गया और विषकी उष्णतासे घबराकर वे पीछे पलट पड़े । उस समय निरञ्जनकी ओरसे विष्णुको आकाशवाणी हुई कि, हे विष्णु ! तुम अपनी