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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 106 of 1367

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Page 106

दर्शन पाया है तो तेरे साथ चलूंगा । तब गायत्रीने मनमें विचार किया कि, मैंको सामने मिथ्या साक्षी देना तो महापाप है तो भी, परमार्थके निमित्त मैं मिथ्या भाषण करूँगी । इसके उपरान्त उसने ब्रह्मासे कहा कि, मैं तेरी साक्षी दूँगी; इतनेमें पुष्पावती नामनी एक दूसरी स्त्री जिसको गायत्रीने उत्पन्न किया था उस स्थान पर उपस्थित हुई । ब्रह्माने उससे भी कहा कि तू भी मेरी साक्ष देना । उसने भी स्वीकार किया कि, मैं भी तेरी साक्षी दूँगी । तब ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावती तीनों मिलकर तथा एक मत होकर अद्याके पास चले ।

तैत्तिरीयसूत्र प्रकरण

ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावती तीनोंका अद्याके पास जाना
और अद्याका उन्हें शाप देना ।

जब ब्रह्मा गायत्री तथा पुष्पावती सहित अद्याके सामने पहुँचे, तब तीनोंने माताको दंडवत् प्रणाम किया । तब माताने कहा कि, हे ब्रह्मा अपना कुशल समाचार कहो और अपने पिताके दर्शनका वर्णन करो कि, कैसे पिताका दर्शन किया ? तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, हे माता ! मैंने अपने पिताका दर्शन भली भाँति किया और पुष्प तथा अक्षत द्वारा उनकी पूजा की, गायत्री तथा पुष्पावती मेरे साक्षी हैं । तब अद्या गायत्रीकी ओर फिरी और कहा कि हे गायत्री ! तू सत्य सत्य कह कि, ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन पाया और भलीभाँति उसका पूजन किया ? तब गायत्रीने उत्तर दिया कि, हों माता ! मैंने स्वच्छभुसे देखा कि, ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन पाया और उसकी भलीभाँति पूजा की । फिर अद्याने पुष्पावतीसे पूछा—हे पुष्पावती ! तू सत्य बता कि, क्या ये दोनों सत्य बोलते हैं ?— तब पुष्पावतीने कहा कि हों माता ये दोनों सच्चे हैं मैंने अपनी आँखों देखा कि ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन किया और उसकी पूजाकि । तीनों की यह बात सुनकर अद्या सोचने लगी कि, अलखनिरञ्जनने तो मुझसे कहा था कि, मेरा दर्शन कोई न पावेगा; उसको यह क्या हुआ कि, इनको दर्शन देदिया ! जब सोचकर २ कुछ समझमें नहीं आया तो अद्याने घबराकर अलख निरंजनका ध्यानकरके उससे पूछा कि, ये तीनों जो कहते हैं, इनमें कहाँतक सचई है सो तुम बताओ । तब निरञ्जनने अद्यासे ध्यानमेंही कहा कि, ये तीनों ही झूठे हैं इन्होंने मेरा दर्शन नहीं पाया है, अपनी बड़ाईके लिये तुमसे असत्य कहते हैं । देखो अनुरागसागर ।