कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 1067 of 1367
Read in contextभूलके लजाने ठनठनानाही है—कबीर साहबकी साखी ।
चारि अठारह नौ पढ़ि, छौपढ़ि खोये मूल ।
कबीर मूल जाने बिना, ज्यों पंछी चण्डूल ।
चारों वेद अठारह पुराण नौ व्याकरण छः शास्त्र आदि तूने पढ़े पर अपने मूलके न जाननेसे इसे खो दिया । अब तू चण्डूल पक्षीके समान टेंटें चच करता फिरता है । इतना पढ़कर भी अपने मूलको न जाना तो तेरा सब कहना सुनना झोंझके समान झन् झनाने एवं पीतलके समान ठन् ठनानेका है ।
गजल— झोंझके तौर झंझनाते हैं । मिसल पीतलके ठन् ठनाते हैं ।
नुक्तःबारीकसे खबर न रही । जैसे चण्डूल चह चहाते हैं ॥
बात इनकी है बा नमक और नाज्र । जालमें मुर्ग फँसाते हैं ।
बेखबर दाममें फँसे मुर्गी । मुफ्त जान अपनी सब गँवाते हैं ॥
ऐसे आलिमसे दे पनाह अल्लाः । आजिज आलममें ख्वारीलाते हैं ।
हजरत ईशाको साधुका आशीर्वाद — जो रीति भारतवर्षमें कहीं कहीं किञ्चित मात्र रह गई है । पूर्वकालमें योरपमें भी यही रीति प्रचलित थी कि, सांसारिक लोग (गृहस्थ) साधुओंकी सेवा करते थे, साधु वैराग्य विवेक संयुक्त भजन किया करते थे । उस समय संसारियोंको साधुओंपर किसी प्रकारका तर्क नहीं था । साधुओंकी सेवा बे अटक करते थे साधुलोग भली प्रकारसे विचारमें लगे रहते थे । जिससे उनका अन्तःकरण प्रकाशित होता था तब सत्य ज्ञान मिलता था । जिससे संसारियोंको उपदेश करके उनका कल्याण करते थे संसारकी मर्यादाको स्थित रखनेके लिये उत्तम २ नियम बनाते थे उस समय तप दान दोनों उचित था, दान और भजनसे दोनोंके अन्तःकरण शुद्ध होते थे, अतः जिस समय हजरत ईसा उत्पन्न हुए उस समय एक फकीरने उन्हें गोदमें लेकर कहा कि, यह लड़का बड़ा प्रतिष्ठित होगा ।
मुहम्मद साहिबको राहिबका आशिर्वाद—ऐसेही बालकपनमें मुहम्मद साहब चचाके साथ बसरा शहर गये । वहाँ राहिब नाम एक ईसाई साधू मिला, वो बड़ी प्रतिष्ठासे मुहम्मद साबसे मिला । उस समय मुहम्मद साहब लगभग बारह वर्षके थे । साधुने मुहम्मद साहबके मुखकी ओर देख करके कहा कि, यह अन्तिम पैगम्बर होगा, उसीने उनके पीठके ऊपर पैगम्बरी मोहर बतलाई सब भविष्य कहा, जिसके अनुसारही सब कुछ हुआ । मुहम्मदी साहिबका हाल