Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 1066 of 1367

Read in context
Page 1066

साधुसे वाक्फल ।

अमृतके श्रोतपर सन्त लोग पहरा चौकी देते हैं जो सन्त गुरुकी सेवा करेगा वही उस श्रोतसे सफल काम होगा दूसरा न होगा । समस्त ईश्वरीय मायिक ज्ञान इसी वर्णमालामें समा रहे हैं । गुरु मिलें तो सचेत कर दें, नहीं तो अचेत होकर भूल अज्ञानमेंही मरेंगे जो लोग साधुसेवा न करेंगे वे मायासे न छूटेंगे, साधुओंकी सेवासे बन्धन छूटेगा, सन्तोंकी सेवा मायाके सेवक क्या जाने ? ।

शब्द-कबीर साहबका

मायाके गुलाम गेदी क्या जानेंगे बन्दगी । साधुनसे धूम धाम चोरनसे करे काम ॥

ढोंगिन संग धूपधापगरीबनसे रिन्दगी ॥

कपटकी माला पहने पाखण्डकी तिलक दिये ।

पापनकी पोथी वांचे डारवे को फन्दगी ॥ दाया नहीं धरम नहीं कैसे पावे चन्दगी ।

कहै कबीर धूग धूग तेरी जन्दगी ॥

सत्सङ्ग हुआ, सन्तकी कृपा हुई नामका पता मिला, तो मोलवी रुम, शाहू बूअली कलन्दर आदिकके समान किताबोंको दरयामें डालकर नाममें निमग्न होगये, पुस्तकावलोकनको तुच्छ समझा, मायामें अमूल्य आयुको नष्ट करना अच्छा न समझा । संस्कृतके स्वरोंको विचार कर देखो, वे ऊपरसे नीचेको आते हैं कण्ठसे गुदा स्थान तक समाप्त होते हैं । स्वरोंसे ऊपर कोई नहीं जाता, सब व्यंजन अक्षर नीचे हीको है इस कारण नीचेकी दशामें रखते हैं ।

प्राचीन कालमें और आजके महाराजोंके मन्त्री—राजा महाराजाओंकी यह रीती थी कि, वे सर्वदा ऋषि, मुनि और तत्ववेत्ताओं विद्वानोंको अपना प्रधान मन्त्री बनाते थे । सर्वदा यही सिखलाते थे कि, शुभकर्म करो, धर्म और दयाको न भूलो, सन्तोंकी सेवा करो । पर वर्तमान कालके राजाओं महाराजाओंकी यह रीती होगई है कि, तत्ववेत्ता हो अथवा न हो, केवल पढ़ा हुआ और काम करनेवाला हो, उसको अपना प्रधान मन्त्री बनाते हैं । वे शैतान सन्तोंकी निन्दा करते हैं उनको तुच्छ समझते हैं । सन्तोंसे द्वेष करनेसे उनका अन्तःकरण मलीन हो जाता है, स्वयं कुमार्गी बन जाते हैं दूसरोंको भी कुमार्गमें भटकाते हैं । इन लोगोंने तोतेके समान विद्या तो पढली, सांसारिक व्यवहारमें चतुर हो गये पर धर्मकी बातोंकी उन्हें सुध न रही ।