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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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देखे तवारीखमें इस समय भी सहस्रों प्रकाशित हृदय, अन्तर्यामी, सन्त महात्मा हैं, पर समयके प्रभावको देखकर अपनेको गुप्त रखते हैं, वे प्रगट करना नहीं चाहते।

योरोपमें साधुओंका दान—दुनियादार और विरक्त दोनों अपने अपने धरम पर स्थित थे। जबसे छापाखाना शुरू हुआ तबसे पुस्तकें बहुत सस्ती हो गईं स्थान स्थानपर पाठशालें हो गईं, लोग पढ़ पढ़कर विद्याभिमानी होने लगे। साधुओंकी निन्दा करना आरम्भ कर दिया, प्राकृतिक जन सन्तोंकी सेवा छोड़ बैठे साधू लोगोंने भजन छोड़कर उद्यम करना आरम्भ कर दिया। योरोपमें हरमिट, फरायर। मङ्गल और कोल नामके साधू लोग रहते थे। गृहस्थोंकी यह रीति थी कि, उनसे कोई अपराध हो जाता था तो उसके प्रायश्चित्तके लिये कुछ रुपया लेकर साधुओंके पास जाते थे। कहते थे कि, हमसे यह अपराध हुआ है, आप यह द्रव्य लीजिये परमात्मासे मेरे अपराधको क्षमा कराइये। वे लोग द्रव्य आदि ले लेते थे एक एक स्वीकृति पत्र दे देते थे। जिसे अंग्रेजीमें पारडन बिल (PARDON BILL) कहते हैं, यह क्षमा करानेके पत्रका नाम है इस पार्डन बिलको अपने पास रखो तुम्हारे अपराधकी क्षमाके लिये मैं ईश्वरसे आशीर्वाद करूँगा। इस प्रकार वे पादड़ी उन रुपयोंको अपने काममें लगाते थे एवं अपराधियोंके लिये ईश्वरसे प्रार्थना करते थे। भारतवर्षमें इस प्रकारके दान और प्रायश्चित्तकी रीती अब भी प्रचलित है। यहाँके धर्मात्मा लोग दान पुण्यसे पाप कटना समझते हैं।

पादरीयोंकी हंसी—विद्वानोंने साधुओं और पादड़ियोंका ठट्ठा करना आरम्भ किया। तबसे यह सब रीतियाँ उठ गईं, अपने समयमें जान मिल्टन साहब अंग्रेजी भाषाके एक बड़े भारी कवि हुये हैं, अपनी किताब (PARADISE LOST) की तीसरी जिल्दमें पादड़ियोंका इस प्रकार ठट्ठा करते हैं, मैं भी उसे पद्यमें बनाकर लिखता हूँ।

जान मिल्टन साहबका बचन।

नञ्जम - हर्मिट व फरायर कौल। और मंक भी इस डौल ॥
करते जो मकरोफरेग। मिक्काज धर दर जेब ॥
जामः सफेदो स्याह। सरपर अजीब कुलाह ॥
गिल गिता पाक मकान। ईसू जहां कुर्बान ॥
चल इश्क से अनसूब। ईसा जहां मसलूब ॥
दिलमें भी है हौस। हम जावेंगे फिर दौस ॥