कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextइकतीसवाँ प्रकरण
गायत्रीका प्रकट होना ।
ब्रह्माकी उस समाधिमें चारों युग बीत गये पर ब्रह्माको पिताका दर्शन नहीं हुआ । तब अद्याने मनमें चिन्ता किया कि, बिना ब्रह्माके सृष्टिको कौन रखेगा ! किसी युक्तिसे ब्रह्माको बुलाना चाहिये । तब उसने अपने शरीरसे मैल निकाला और उस मैलसे एक कन्या बनायी । और उसका नाम गायत्री रखी । कन्याने अपनी मातासे पूछा कि, हे माता ! तुमने मुझे किस निमित्त उत्पन्न किया है ? अद्याने उत्तर दिया कि, बेटी तेरा बड़ा भाई ब्रह्मा है और वह अपने पिताके दर्शनोंके निमित्त उत्तर दिशाको गया है, वह किसी युक्तिसेभी अपने पिताके दर्शन नहीं पासकता और यहाँ उसके बिना संसारकी उत्पत्ति हो नहीं सकती । इस लिये तू जा और उसको समझाकर ले आ, जिसमें संसारकी उत्पत्ति हो ।।
बत्तीसवाँ प्रकरण
पुष्पावतीकी उत्पत्ति और ब्रह्माकी वापसी ।
अपनी माताकी आज्ञा पातेही गायत्री उत्तरकी ओर चली और चलते २ उस स्थान पर जा पहुँची जहाँ ब्रह्मा समाधि लगाकर बैठा था । ब्रह्माकी अखंड समाधि लग रहीथी, और गायत्री खड़ी सोच रही थी कि, अब मैं क्या करूँ, ब्रह्माको समाधिसे कैसे जगाऊँ ? ऐसा न हो कि, ब्रह्मा मरे जगानेसे समाधिसे जागकर क्रुद्ध हो और मुझको शाप देवे । इस प्रकार गायत्री अपने मनमें सोच ही रही थी कि, उसके ध्यानमें अद्या समायी और उससे कहा कि हे, गायत्री ? तू ब्रह्माके चरण छू तो ब्रह्मा जागेगा । गायत्रीके ब्रह्माका पैर छूतेही ब्रह्माके नेत्र खुलगये तब उसने गायत्रीको अपने सामने खड़ी देखा । फिर अत्यंत रुष्ट होकर कहने लगा कि, तू कौन दुष्टा पापिनी है कि, मुझको मेरे पिताके ध्यानसे जगा दिया, मैं तुमको शाप दूंगा । तब गायत्रीने कहा कि, मेरा कोई दोष नहीं है, यथार्थ बात जानकर तब मुझको शाप देना । तुम्हारी माताने तुम्हें लेनेके लिये मुझको भेजा है, सो तुम शीघ्रचलो नहीं तो पछतावोगे । तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, मैं कैसे चलूँ मुझे पिताके दर्शन तो हुएही नहीं । तब गायत्रीने कहा कि, तुम्हें किसी युक्तिसेभी पिताका दर्शन तुमको न होगा । तब ब्रह्माने गायत्रीसे कहा कि, यदि तू मेरी साक्षी माता के सामने दे कि, मैंने अपने पिताका