कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
८४
कबीरकृष्णगीता ।
बहुर कीन्ह मैं सुमरण साईं । सीस मोर धड लागे आई ॥
तब मैं जाना पुरुष दयाला । सेवक चूक न मन महीं चाला ॥
निशि दिन धरों मैं पितु पगु ध्याना । पै कछु मन महीं भौ अभिमाना
तब तुम योहिं भ्रम कर डारा । कबीरते आद अंत यम हारा ॥
जो सतनाम राखे तो रहऊं । डाहे तो बिन अगिन डहाऊं ॥
दोहा—सत्यकबीर जो सुमरहीं, तोहि मैं निकट न जाऊं ।
कबीरके भक्त विद्वान जो, कहे काल तेहि खाऊं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण सनकादिक सुनहूँ । आद पुरुष कबीर चित गुनहूँ ॥
सनकादिकवचन
कहे सनकादिक अब हम चीन्हा । सब मूल कबीर गम कीन्हा ॥
अब हम सत्यकबीरके शिष्या । कबीरके सुरत हृदयमो लिखा ॥
बला सुत हम सहस्र अठासीं । कबीर बिना सब परे यमफांसी ॥
अब जिव सत्य कबीरहिं दीन्हा । कबीरके अगुवा विष्णुहिं चीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जब लेहो परवाना । यम त्रिण तोर संहाय सतनामा ॥
यह सुन सनकादिक धर ध्याना । कृष्णके स्तुति आप बखाना ॥
सत्यलोकके हंस संग आये । झलकत झलझल सुवास बसाये ॥
कोटिन रावे शशि एक न तुलहीं । एक हंस ससि अर्बन तुलहीं ॥
शोभासिंधु राससुख मूछं । ताहि सुख जेहि कबीरसम तुछं ॥
सत्यकबीर जग दास कहाये । साधरूप धर भक्त हठाये ॥
इह हम कहैं यमसुखते बचावा । जगमहैं हमरे नाम खिडावा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८५
कहै कृष्ण पग समर्थ नाई । कहैं लग कहों मैं समर्थ बढाई ॥
सतकबीर मेटो यम दुःखा । सनकादिक सुन प्राण पिशुषा ॥
यम त्रिण तोड कालसुख थूका । आरती यंगल यम धर लूका ॥
दोहा—दियो पान सनकादिको, मग्न भये सब साथ ।
कहे सनकादिक सुख भये, मिटा काल आध ॥
कहैं सनकादिक धन्य सतनामा । क्षण यहैं हम सबको भो कामा ॥
जै जै सत्यकबीर दयाला । सनकादिक जप कबीरको माला ॥
मग्न भये सब तन मन शोधा । पांच पचीस मन सहज सभोधा ॥
चैदह यम त्रिगुण जेहिथाकी । अरिहित सम लघु दृग एक ताकी
धन्य सो सतकबीर सत्यनामा । मैं लघु सेवक कबीर सुखधामा ॥
सयकादिक बहु स्तुति कबीरा । सुरति निरति गहि तन मन थीरा
व्याघ्र भ्यानहर अज बिग कागा । चारों झोहर करने लागा ॥
सब हरे सनकादिक क्रांति । मिल सनकादिक साधुके पांती ॥
एक बारके हुकार सब गजी । आप आप कह अज हरी तजी ॥
तब कबीर सनकादिक आगे । सतकबीर आवत यम भागे ॥
कछु पग जाय भये चक्षुहीना । बहुर कुष्ट होय चुये अभीना ॥
पगुके हीन भये सिर कूटा । जरि भो चिता केर जस खूंट ॥
दोहा—चारों मूठ नर पूछे, कहे आप महशोय ।
जो कबीर ना आवते, तो सब खात बिगोय ॥
ऐसे भौ पुन चारों वेदा । स्तुति करहि कबीरको भेदा ॥
कहा कबीर वेद समुझाई। धर तन शक्त करहु मनलाई ॥
८६
कबीरकृष्णगीता ।
चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥
सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥
आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥
भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥
सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥
सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥
भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर
भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥
तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥
विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥
अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥
दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं ।
साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥
एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥
सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥
भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥
दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥
बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥
खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥
मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८७
कै प्रहापे अहि धाय विष्णु पर । सतकबीर तब कहा सुरलीधर ॥
सहस्रमुख सन्मुख कबीरा । पुन कबीर घर अमित शरीरा ॥
रूप कबीर देखत यम हारा । आपन विष भौ आपहिं छारा ॥
लीन्ह उवार विष्णुहिं सतनामा । जै कबीर कह विष्णु प्रणामा ॥
जै २ सत्यकबीर अरिघातक । काल मर्दन रक्षक सतपातक ॥
सत्यकबीर सबे गुण आगर । पतित तार देहीं सुक्त उजागर ॥
इंद्र रुद्र सब देव जिआये । सब देवन मिलस्तुति लाये ॥
सहस्रमुखी तब विष्णुहिं कीन्हा । महाविष्णुकी पदवी दीन्हा ॥
वेद विदित जाने संसारा । सहस्रसिरषा पुर्ष विचारा ॥
सहस्रसिरषापातिआनंदसिपासो । सो सतपुरुष कबीर दिखासो ॥
एक अनंतकी कौन बतावे । कोट अनंत पार नहिं पावे ॥
जाके खोजत सब पचहारे । सो सतनाम कबीर पुकारे ॥
जासु अंस एक रोम निरंजन । सो सतनाम कबीर दुखभंजन ॥
जिन प्रभु इच्छाते सब कीन्हा । सो सदुरु कबीर हर चीन्हा ॥
महाविष्णु औ विष्णु व्यासा । सत्यकबीर सुभरो हरि स्वासा ॥
दोहा—सत्यकबीरसत्यनामप्रभु, दुखनासिकासुखधाम ।
सर्व मई सो रम रहे, संतनमें विश्राम ॥
जहां सांच तहैं प्रगट आही । दयाहीनके निकट न जाही ॥
गुरु भक्त सबते अधिकारी । साध भक्त गुरु भक्त सुखारी ॥
कोटिन देवी देव अराधे । विन गुरु भक्त काल घर बाधे ॥
कोट अनंत कर्म संसारा । गुरुके भक्त विनसवे असारा ॥
८८
कबीरकृष्णगीता ।
इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥
गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥
गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥
विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥
सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥
जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥
एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥
तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥
सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥
दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त ।
विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥
जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥
पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥
निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥
विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥
कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥
जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥
सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥
बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥
कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥
तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥
अवतारोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
८९
धरणी अकाश पवन औ पानी । चंद सूर्य जेते नष सानी ॥
सबके आद सोहे सतनामा । सच दया मिल जीवको कामा ॥
सर्वमूल अविनाशी रामा । सोई सतकवीर सुखवाया ॥
जो सुभरे सतनाम कवीरा । ताके काल न आवे निषरा ॥
कीन्हो स्तुति विष्णु बहुता । कहा कवीर वैठहु पूता ॥
तुम स्तुति जब बहुते कीन्हा । तब हम आय दरशतोहि दीन्हा ॥
कौन काज तुम सुभरेहु मोही । टोरो सब संकट जत तोही ॥
परहि कालमुख झरकहि जबहीं । सतकवीर कह चितवे तवहीं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण पलकन पग झारे । मैं नाती तुम आज्ञा प्यारे ॥
धन्य भाग्य मम शुभ दिन मोश । दीन्हो दरश कवीर बंदीछोरा ॥
कवीरते अधिक और नहि कोई । आद अंत सब जिनते होई ॥
हम सब हैं कवीरके अंसा । सतकवीरके सब निज वंसा ॥
सिद्ध साध मत वेद पुराना । सतकवीर गुण सबहि बखाना ॥
कवीर निरवान मुक्तके दाता । जाको अंत न लखे विधाता ॥
दोहा—सब करताके करता, सब दाताके तार ।
सकल मूल सतसाहेब, सो कवीर औतार ॥
सच २ सच हर गई । सतकवीर जिव रक्षक भाई ॥
ये कवीरको महिमा जानो । और सब मनभत बौरानो ॥
गरुड चरण हरि शीस नवाई । महिमा कृष्ण कवीर परवाई ॥
अस शोभा नहि देखो काहू । करता कृष्ण राम तुव आहू ॥
५
९०
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सोई पुरुष कबीर है, जेहि हम कीन्हो खोज ।
सबे कहै मोहि वाउर, कहै भसुंड बनरोज ॥
त्रेता रामचंद्र मोहि जांचा । नागफांस परिचित भौ कांचा ॥
तहां पहुँच अहिनास उबारा । तब मैं करतातेहिनावविचारा ॥
करता निरबंद योनि नहि आवे । नागफांस तेहि बांधको पावे ॥
तब हम चीन्ह कौसिल जाये । भक्तवत्सल क्षत्रीरूप धर आये ॥
दोहा-क्षत्रीरूप राजसी, सातकी सद्गुरु रूप ।
तमगुण तामस सकल सब, त्रिगुण बित्त तेहि भूप ॥
अब हम सत्यपुरुषको चीन्हा । कबीरकेस्तुतिगरुडबहुकीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण गरुड तुम जानहु । कबीरकेअंस सुपच पाहिचानहु ॥
जिनके भोजन घंट जो बाजा । अधर अकाशजो धजा विराजा ॥
सो कबीरके सेवक रहई । जेहि सपनाकोउतिहँपुरअहई ॥
उधसेन भक्त बंद मै छोरा । ताते मोहि संत कहैं बंदिछोरा ॥
कबीर छोरहिँ चौरासी यम फंदा । निर्गुण नाम कबीर निर्दिदा ॥
जापर दायरा करहिँ सतनामा । सो देखे सतलोक सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण सुन आसन मोरा । महा सुज्ञान गरुड बल जोरा ॥
हमही रहे त्रेता रघुवंसा । तवहीं कबीर मेटे यम संसा ॥
सतकबीरके अंस एक राऊ । सो पूंजी यम पितहिँ दियाऊ ॥
राय रभिता राम सोहँगी । ताके नार देह अर्धगी ॥
रामचंद्र अर्धगी सांता । रावण चोर संधि सिर दीता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
९१
तेहि प्रति रामचंद्र दुख पावा । वन २ रटत वचन पितु पावा ॥
वचन सरूप धरे सब देवा । डासन त्रिण भोजन फल मेवा ॥
सिंधु सेत वांधे हरि ताका । पर्वत सबे सिंधु महीं राखा ॥
वांधन लगे सिंधु गंभीरा । तब हरि सुमरे सत्यकवीरा ॥
आय कबीर तुरत दरसावा । कबीर रूप हरि हृदय समावा ॥
रामचंद्रके हृदय कबीरा । आद ब्रह्म कबीर गंभीरा ॥
कबीरके अंस हैं लक्ष्मण वाला । लिखा मेर पर अंक रिसाला ॥
लक्ष्मण अंक सेतु लेहु वांधा । रामचंद्रका छूटा धंधा ॥
उत्तरा सैन लंकागढ दूटा । सकल देवका वंदी छूटा ॥
दीन्हो राज्य विभीषण थापी । कोइ न वांचे राक्षस पापी ॥
सिय बंदिछोर राम लियो संग। । सत्यकबीर प्रताप सुरंगा ॥
सुन खगपति सब देव मुनीसा । सृष्टि कबीर सबन कहैं दासा ॥
दोहा—कहैं कृष्ण सुनु देव मुनि, रक्षक नाम कबीर ।
हमहिं औसर सुमरहीं जन, गाठे परे शरीर ॥
जीवके सुख देवे कारण । पुरुष कबीर प्रगट कलि सारन ॥
रामनाम गुरु महिमा भाषा । सत्संगतके इच्छा राखा ॥
सत्संगत गुरु मार्ग पाई । गुरु सदुरु मिल ज्यास नसाई ॥
खरा खोटा परख दिखाये । सदुरु सो जिन सत्य चिन्हाये ॥
निर्गुण एक कबीर बखाना । सर्गुण सकल देव मिल जाना ॥
निर्गुण बोलता कबीरको अंसा । रमता राम सकल घट हंसा ॥
कहैं कृष्ण कबीर परजाई । सदुरु सत्य कबीर गोसाई ॥
९२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सद्गुरु सत्य कबीर हैं, निहचल अजर शरीर ।
भौसागर तारन तरन, समर्थ सत्य कबीर ॥
व्यास सुखदेव समेता । अज हरि हर प्रभु कृपानिकेता ॥
नारद ऋषि इंद्रादि सनकादी । सके न कोई कबीरसंवादी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुखदेऊ । कबीरहिं मानुष कहे जनि कोऊ ॥
कबीर सर्वाधिक करताके करता । भरी ठरै फिर खाड़ी भरता ॥
भक्त रूप धर प्रगट दिखाये । गुरुकी भक्ति ठिग दास कहाये ॥
युग २ रक्षा हमरी कीन्हा । भक्त रूप होय दर्शन दीन्हा ॥
रामरूप संग लक्ष्मण सीता । सत्यकबीर बन दास पुनीता ॥
दोहा-कहैं कृष्ण सब कोइ सुनो, इत उत दास कबीर ।
सतकबीर सत युग २ सुमेर, दोउ दीन गुरु पीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास सकल मिल वाणी । धन्य कबीर जेहि कृष्ण बखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख देऊ । हमहु न लखा कबीरका भेऊ ॥
जब कबहुँ हम त्रसित निरंजन । तहां कबीर काल शिर भंजन ॥
कबीरको चरणोदक जब लीन्हा । जबते अगम गम्य हम चीन्हा ॥
हमरे कहे के पिता निराकारा । हम कहै ये कबीर प्रतहारा ॥
कबीरके पांव निरंजन लागे । और जीव कहा कस आगे ॥
निरंजन एक दिन प्राप्त धाये । कबीर नाम जप जीव बचाये ॥
गुरुभक्तिकी महिमा
कवीरकृष्णगीता ।
९३
दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।
अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥
कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥
जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥
तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥
संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥
जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥
रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥
परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥
दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥
सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥
कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥
तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥
तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥
तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥
सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥
बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥
चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥
दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।
हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥
गरुडकी चेतना - गरुड और कबीर सम्वाद
९४
कवीरकृष्णगीता ।
सकल देवता सुन थर हरेऊँ । धाय कवीरके चरणन परेऊ ॥
चरणोदक लै मुखमहँ लीन्ह। चरण परसि प्रदक्षिण कीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो सुनि व्यासा । गुरुके भक्त कटे यम फाँसा ॥
गुरु विन राम न भावे हांथा । गुरु विन डोलहिँ जीव अनाथा ॥
गुरुकी भक्त साधुकी सेवा । हरषि गोपाल मिले यह भेवा ॥
हमहू गुरुको करता जाना । काउ जीत गुरु नाम बसाना ॥
गुरु सोई जो अंतहु थीठा । जन्म बरण गुरुलागे सीठा ॥
दोहा—योग यज्ञ तप तीर्थ, प्रतिमा भूत मसान ।
कहँ कवीर सदुरु विना, जीव जात यम थान ॥
उठके गरुड टाढ बये आगे । हरिसों विनती करने लागे ॥
आज्ञा देहु मोहि त्रिसुवननाथा । हमहु जीव निज करहु सनाथा ॥
हम कवीर कहँ सदुरु करहीं । सेवा तुम्हार ध्यान उर धरहीं ॥
कृष्ण विहँस कहवे अस लीन्ह। सुनहु विहँग सबन चित दीन्ह ॥
यहिते श्रेष्ठ अमर कछु नाहीं । धन्य सो जो गुरु शरण समाहीं ॥
हमहू गुरुके शरण समाने । सदुरु कर कवीर कहँ जाने ॥
कबीरके आस सबनको भाई । कहहि कृष्ण पुन गरुड बुझाई ॥
दोहा—खगपति गये कवीर पहुँ, शरण देहु सतनाम ॥
यमसे त्रास निवारहु, देहु भक्त सतधामा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो खगराई । बडे भाग गुरु शरण समाई ॥
गुरुकी आज्ञा शिष्य जो माने । शिष्य सोईजो गुरु सुरति समाने ॥
कबीरकृष्णगीता ।
९५
चरण टेक विनवें नभगामी । आज्ञाकरहु सो मागो स्वामी ॥
कहो तो सीस कल्प सुँइ धरऊँ । कहो निजहु तासन परऊँ ॥
हमहू गुरुकी महिमा जाना । गुरुते श्रेष्ठ और नहीं आना ॥
हम त्रिभुवन पातिके सुखपाला । हमरे पीठ जो सदा गोपाला ॥
जब हम देस गोपाल तेहि सेवा । परेउं चरण तर लीन्ह तुव भेवा ॥
दोहा—कहे तक्षक आरि जोर कर, विनय सीस पग राख ।
काटहु यम कर फाँस प्रभु, गुरुड दीनता भाष ॥
कबीर वचन ।
कहे कबीर सुनो खगराया । मिले ना समर्थ सद्गुरु दाया ॥
आपन जीव सम सब कह लेखे । एके राम सकल घट पेखे ॥
सुर असुरारी चाल निहारे । नीर क्षीर बिलगाइ सुधारे ॥
ज्ञान औ मनकी दशा विचारे । सतपद गहि गुरु सुरत निहारे ॥
जेते आमिष मीन मद मांसू । परधन परनिंदा उपहासू ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन गुरुड सुजाना । अंकुर सुगंध पवित्र फुल पाना ॥
दोहा—गुरु कहैं करता जाने, साधन गुरु कह लेख ।
कहैं कबीर सुन खगपाति, राम सकल घट देख ॥
गुरुडवचन ।
गुरुड कहे तब सीस नवाई । सत्यकबीर तुम समर्थ साई ॥
तुम्हरे सिखापन हृदय मानो । शरण देहु कहे श्रीमगवानो ॥
कबीरवचन ।
श्रीकृष्ण तुम त्रिभुवन राऊ । गुरुडहि बोधे कहहु सुभाऊ ॥
१६
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-शब्द हमारे शीतल, अमृत मोद सो भाव ।
भक्तपंथ समिता ज्ञान दृढ, अभे सुक्त पद लेव ॥
भले गुरुड जाय आनहु साजा । गह २ वैकुंठ वाजन बाजा ॥
कहे गुरुड भाषहु प्रभु साउज । सत्यपुरुष कह चढे सब सांउज ॥
कहे कबीर नारिअर भरपूरा । सेत गरी मिष्टान खजुरा ॥
दोहा-पान फूल चंदन सुाचि मेवा, गऊ घृत जोत प्रकाश।
सो अमर प्रत नाम गुरु, चरण सतिहर दास ॥
सेत सिंहासन क्षत्र चंदेवा । ध्वजा पताका सेत सजेवा ॥
गुर मिष्टान छान जल झारी । थार जोतिधर पंच मुख वारी ॥
आज्ञा मांग गुरुड उठ धाये । तैतिस कोट देव हकराये ॥
सवा लाख नीरअर ले आना । सवा सो मन मिष्टान प्रवाना ॥
कृष्णहि नेवत दीन्ह कर जोरी । तुव प्रताप गुरु मम बंदछोरी ॥
शिव सनकादि ब्रह्मादि विष्णुवादी । देवकृष्ण सुन सुखसे सादी ॥
सब मिल आय कीन्ह धुन ध्याना । भजन अखंड शब्द प्रवाना ॥
दोहा-सकल देव मुनि चक्रित, गुरुड शरण सतनाम ।
सत्यकबीर जो सुमरे, तेहि गाढे आवे काम ॥
दीन्ह पान यम त्रिण तोराई । चरणासुत तिलक दठाई ॥
पाय प्रवाना गुरुड अनंदा । जस चकोर पाये निस चंदा ॥
महायसाद सकल मिल लीन्हा । विनवहिं गुरुड असीस तब दीन्हा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण स्वगति बढ भागी । तुम सदुरुके दास सुभागी ॥
धन्य भाग तेहि प्राणी केश । शरण कबीर गये दुख फेरा ॥
कबीरकृष्णगीता
( ९७ )
सरगुण भक्त जो आवा गौना । तन थर दुख सुख पावे पवना ॥
निर्गुण भक्त शरण सतनामा । नाम कबीर भजन सुखधामा ॥
दोहा—कहैं कबीर सुन खगपाति, नाम कबीर कंडहरा।
निरगुण भक्त सब ऊपर, आवागवन निवार ॥
सकल देव मिल स्तुति लावा । बडे भाग हम दर्शन पावा ॥
व्यासदेव सुखदेव सुनियारद । विनती करें सुरपाति गण शारद ॥
श्रीकृष्णसे पूछे व्यासा । कबीरकी माहिमा करहु प्रकाशा ॥
तुमते भेछ कबीर कस भयऊ । यह चरित्र हम जान न पायऊ ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख जाना। कबीर आद करता निरवाना ॥
निरंजन हमरे पिता दृग काला । जार मार जिव करहि बेहाला ॥
सतकबीर काल शिर भंजन । कबीर नाम ते त्रसित निरंजन ॥
दोहा—तीन लोकते न्यारा, अमरलोक विस्तार ।
जो कबीरको सुमरे, सोइ उतरे भौपार ॥
कहैं कृष्ण मैं कहों परमारथ । निर्गुण भक्त जन्म जुग स्वारथ
जब कलकाल निरंजन कोपिहै । भिटिहै दया धर्म विश रोपिहै ॥
गंगा सती सिद्ध औ साधक । सबके सत घटि है कलबाधक ॥
गिराकार सब जीव गरासे । भक्तहीन तेहि काल तरासे ॥
निर्गुण भक्तिहीन जो प्राणी । पापी पुनी जार सब सानी ॥
सबकर सत् काल बिचलाई । कबीरसे संत अडे रहाई ॥
गाहैं ताहि कबीर ले राखी । आगे तेहि निजु कबीर हरि भाबी ॥
९८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-अजर मुक्त सो पावे जो, सुभरे सत्यकबीर ।
नरकी दैही त्यागके, हिरंमर धरे शरीर ॥
७३ पंडव नारद सुख व्याप्ता । एक दिन सुन कस भयउ तमाप्ता ।
जीव एक सतलोक चलि जाई । दूत ताहि नहिं पायउ प्राई ॥
गये दूत धर्मरायके पास । धर्मराय आप यम वासा ॥
हम त्रिय बंधु यम सहित सिधायो । हेरत जीव कितहु नहिं पाये ॥
सब थाके हम देश देखा जाई । सुन्यके पार मानसर जाई ॥
महासुगंध देश उजियारा । कामिन शोभा अकह अपारा ॥
कोटिन चंद सूर्य छवि एका । हंस असंख हंसनि तेहि रेखा ॥
दोहा-जहैं सतपुरुष कबीर निज, सो नहिं देखेउं ठौर ।
पुरुषलोकको आभा, मानसरोवर मोर ॥
अपनी कंचन उदित अटारी । हंसनीको लगी गंध हमारी ॥
द्वारपाल एक पठडन वेगी । देश निकार धायो बहु वेगी ॥
मोहिं घर बांहनीकारीस बाहर । मैं सुभरेउं कबीर तेहि ठाहर ॥
तहैं कबीर मोहि लीन्ह बचाई । बार अनेक दया उर लाई ॥
जहांसे गयऊं निरंजन खोदा । कबीरके आद न जाने वेदा ॥
कबीर सबनके आद बखाना । कबीरके आद कोई नहिं जाना ॥
कबीर नाम कायाको वीरा । कदली तन पौनगरसीरा ॥
दोहा-काया कदल दल, गुप्त प्रगट कबीर ।
सबके भीतर बाहर, स्वास निहस्वास शरीर ॥
सचलोककी ऐसी शोभा । कहि न सिराय मोर मनलोभा ॥
एक हंस तरवन जोती । छिन्न एक महैं देखऊं ससीकोती ॥
कृष्ण गरुड सम्वाद
कबीरकृष्णगीता ।
९९
एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥
निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥
जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥
तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥
तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥
दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।
ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥
जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥
सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥
सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥
विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥
कबीरवचन ।
हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥
हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥
जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥
दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।
दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥
गरुडवचन ।
गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥
कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥
कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा
औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥
१००
कबीरकृष्णगीता ।
श्रीकृष्णवचन ।
सुन खगेशे कहे त्रिभुवनराई । सबकी गति मैं कहों बुझाई ॥
सतकबीरकी भक्ति जो करि हैं। सो सत सत्यलोकपगु धरि हैं ॥
अमरवीर हिरभर काया । सवी सुवास अभी फल पाया ॥
दोहा—सत्यकबीरके सेवक, बहुर योनि नहीं आव ।
अमरलोक सुख विलसे, निरभे कैल कराव ॥
निरगुण अजर कबीरा जिवतारा । सरगुण भक्त जो दस औतारा ॥
नकली निरगुण निरंजनराई । जिनके हम योहदार कहाई ॥
सकल मूल निरगुणकबीरा । सरगुण राम कृष्ण मम लीला ॥
हमरी भक्ति जो करे सचेता । सब तज गुरु साधुनसो हेता ॥
ब्रह्म बोलता पूजे सोई । माटी पाथर साधु न जोई ॥
कपिलगऊ भाव धर रहई । भला बुरा ये सबके सहई ॥
जीव मृतक होय मोहिं भावे । सब वैकुंठ साधु तन पावे ॥
दोहा—जवलग मैं वैकुंठ रहों, तवलग मेरे पास ।
प्रभु आज्ञा मैं औतारों, मम अश्रित गर्भवास ॥
रहित मुक्त नहीं हमरे हांथा । रहित मुक्त कबीर गुरु दाता ॥
करे मम भक्त देह मैं तारों । सत्यकबीर देह निस्तारों ॥
सद्वरु समर्थ रूप हमारा । योह समान को आन विचारा ॥
एक भैन औ कबीरसे भाई । कलुक निरंजन अस्थान जब जाई
और सब हैं हमरे आसा । शिव अज सनकादिक मम दासा ॥
देह मुक्तको हम हैं दाता । जीवके मुक्त कबीरके हांथा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०१
देह सुक करे सो पावे । पाप पुण्यमहैं आवे जावे ॥
गाढके हीन सो दानहि पावे । तेहि औसर साकट पछतावे ॥
दोहा—देह सुक थह जानहु, देह धरे फल पाव ।
सत्यकबीर जो सुमरे तो, बहुर योनि नहिं आव।
रज तम लक्षण भूत पिशाचा । सतगुण साधु संत प्रकाशा ॥
रज तम चाल परे चौरासी । सतगुण देह सुक विश्वासी ॥
कर्म भ्रमकी छूटे आसा । आवागैन निरंजन फांसा ॥
निरंजन सेवक कबीरको अंसा । कबीर जेमुख तेहि विषंसा ॥
दोहा—खरा खोटा सब पाखे, पारसी निरंजन राय ।
पुरुष प्रवाना देखि सिर नावे, विना छाय धरखाय ॥
कहे कृष्ण पंनग अरि सुनहू । कहूं ज्ञान अपने मन गुनहू ॥
सतगुरु भक्त पपील चलानी । निरगुण भक्त विहँग बखानी ॥
पंछी विहँग उड जाय अकाशा । नहिं पपील चढ सके बेआसा ॥
जहां इच्छा तहैं जाय विहँगा । चढ़ि सरगुण मता अुअंगा ॥
कोट माहि सरगुण गति पावे । निरगुण भक्त सबे तर जावे ॥
दोहा—निरगुण महिमा अगम है, सरगुण सके न कोय ।
सरगुण उपजन विनसन, निरगुण विन गति नहिं होय ॥
सतयुत नेता द्वापर काली । चहुँगुण निरगुण अजर अमाली
निरगुण सरगुण सबके मूला । सोई सत्यकबीर हरि बोला ॥
दोहा—हमरी तुम्हरी को कहे, कबीर सबनके मूल ।
कहे कृष्ण सुने खगपती, को कबीर सम तूल ॥
शुकदेव कबीर सम्वाद
१०२
कबीरकृष्णगीता ।
बोले गरुड विहसिके वाणी । मम जीवन शुभ सट्टरु जानी ॥
चरणोदक ले निर्मल भयऊ । सट्टरु चरण हियभहँ धरऊं ॥
व्यासदेव सुखदेव सिर नाये । बडे भाग्य हम दर्शन पाये ॥
व्यासदेव सुनि नारद पूछा । हमहुको है भक्तिकी इच्छा ॥
पान प्रवाना हमको दीजे । सुत्कदान हमहूको कीजे ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । जीव दया विन मुक्त न होई ॥
जीवदया धर सट्टरु सेवे । सबसे गीत नाम चित देवे ॥
सबमें सोर मिता अब राधा । स्थिर सत्यनाम निज नामा ॥
विना भक्ति भगवंत न भेटे । सट्टरु विना ना संशय भेटे ॥
सट्टरु कहैं कबीर हम आहीं । सट्टरु अंश विष्णुके माहीं ॥
सट्टरु अंश जीव सत सबमें । राम कृष्ण मम अस कहो अवमें ॥
हमरे अंश निरंजन राधा । तीन लोक अधिकार तिन पाया ॥
तिन पुन आपन अंस उत्पाना । छल छुटम मान अभिमाना ॥
छल औ क्षुद्र विष्णु बहुरंगा । ब्रह्मा कुभत हंग रुद्रंगा ॥
रजगुण ब्रह्मा विष्णु सतोगुण । काल प्रले जन रुद्र तमोगुण ॥
अष्टंगी वटपारकी बुदिया । वटपार निरंजन सब जिव लटिया ॥
एक सै वै विष्णु सत भाषा । विष्णु नाम तब सट्टरु भाषा ॥
रजगुण तमगुण लोहु धातू । पुरुष अंस जीव सट्टरु सातू ॥
दोहा-निरंजन जीव झरकावे, सवा लक्ष नित खाय ।
कहैं कबीर जो मोही भजे, तेहि यम निकट न जाय ॥
कवीरकृष्णगीता ।
१०३
व्याससुखदेववचन ।
व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥
विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥
अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥
दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥
चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा
हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥
साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥
बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥
कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥
हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥
हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥
सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥
जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥
विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥
क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥
जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥
हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥
सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥