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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Devanagarihipublished168 pages

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कबीरकृष्णगीता ।

१०१

देह सुक करे सो पावे । पाप पुण्यमहैं आवे जावे ॥
गाढके हीन सो दानहि पावे । तेहि औसर साकट पछतावे ॥

दोहा—देह सुक थह जानहु, देह धरे फल पाव ।

सत्यकबीर जो सुमरे तो, बहुर योनि नहिं आव।
रज तम लक्षण भूत पिशाचा । सतगुण साधु संत प्रकाशा ॥
रज तम चाल परे चौरासी । सतगुण देह सुक विश्वासी ॥
कर्म भ्रमकी छूटे आसा । आवागैन निरंजन फांसा ॥
निरंजन सेवक कबीरको अंसा । कबीर जेमुख तेहि विषंसा ॥

दोहा—खरा खोटा सब पाखे, पारसी निरंजन राय ।

पुरुष प्रवाना देखि सिर नावे, विना छाय धरखाय ॥
कहे कृष्ण पंनग अरि सुनहू । कहूं ज्ञान अपने मन गुनहू ॥
सतगुरु भक्त पपील चलानी । निरगुण भक्त विहँग बखानी ॥
पंछी विहँग उड जाय अकाशा । नहिं पपील चढ सके बेआसा ॥
जहां इच्छा तहैं जाय विहँगा । चढ़ि सरगुण मता अुअंगा ॥
कोट माहि सरगुण गति पावे । निरगुण भक्त सबे तर जावे ॥

दोहा—निरगुण महिमा अगम है, सरगुण सके न कोय ।

सरगुण उपजन विनसन, निरगुण विन गति नहिं होय ॥
सतयुत नेता द्वापर काली । चहुँगुण निरगुण अजर अमाली
निरगुण सरगुण सबके मूला । सोई सत्यकबीर हरि बोला ॥

दोहा—हमरी तुम्हरी को कहे, कबीर सबनके मूल ।

कहे कृष्ण सुने खगपती, को कबीर सम तूल ॥