काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७ )
'त्रीनग्नीनिव कौरव्व्यान् जनयामास वीर्यवान् ।
उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥
जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति ।
तेषु तातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥
अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।
जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ।
स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥'
( म० भा० आ० प० )
अर्थात् महर्षि व्यास तीन अग्नियों के समान तेजस्वी कुरुवंशीय धृतराष्ट्र
पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न कर तप करने वन में स्थित अपने आश्रम में चले
गये । उनके उत्पन्न होने, बढ़ने और परम गति को प्राप्त होने के अनन्तर
महर्षि व्यास ने मनुष्य लोक में महाभारत का निरूपण किया । हजारों ब्राह्मणों
के साथ जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत
सुनाने की आज्ञा दी । वैशम्पायन यज्ञ के सदस्यों के साथ आसीन होकर यज्ञ
के मध्य-मध्य के विराम में उनसे प्रेरित होकर महाभारत सुनाया करते थे ।
इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के सर्पयज्ञ समाप्ति के पूर्व और धृतराष्ट्र पाण्डु एवं
विदुर के देहावसान के अनन्तर महाभारत संहिता की रचना हुई ।
यद्यपि पाण्डु का निधन पहले ही हो चुका था तो भी धृतराष्ट्र को युद्ध
के बाद बीसवें वर्ष में परम पद प्राप्त हुआ । १५ वर्ष तक तो धृतराष्ट्र युधिष्ठिर
के साथ ही रहे । सोलहवें वर्ष में भीम के वाग्बाण से निर्विण्ण होकर विदुर
के साथ वन चले गये ।
'ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः ।
राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीड़ितः ॥'
( म० भा० आश्रमवासिकपर्व २।१२ )
वहाँ धर्माचरण करते हुए एक वर्ष बीतने पर देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर