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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

by धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज

DevanagariHindipublished115 pages

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( ६ )
करने के लिये स्त्री रूप धारण कर ब्रह्मा से प्रार्थना की ( महाभारत आदि
पर्व ६४ ) ।
अग्नि ने ब्राह्मण रूप धारण कर वासुदेव ( भगवान् श्री कृष्ण ) और अर्जुन
दोनों से खाण्डव बन जलाने के लिये याचना की । ( म० भा० आ० प०
२२४-२२५ ) पुरुष रूप से ( म० भा० आ० प० २३० ) तथा अग्नि रूप
से ( म० भा० आ० प० २२७ ) खाण्डव वन को जलाया; इत्यादि स्थलों
में मिलता है ।
स्वयं महाभारत की पुष्पिका में 'शतसाहस्र्यां संहितायाम्' सौ हजार वाली
संहिता में ऐसा लिखा है । ये सब, महाभारत एक लाख श्लोक का है, इस में
प्रबल प्रमाण हैं ।
मुसलमान इतिहास लेखक अलबेरूनी के अनुसार महाभारत १८ पर्वों
का एक लाख श्लोक वाला ग्रन्थ है ।
दण्डी ने 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भुतार्थां बृहत्कथाम्' से जिस बृहत्कथा
का स्मरण किया तथा 'प्राहुः' परोक्षभूत का रूप देकर उनसे बहुत पहले
बृहत्कथा की स्थिति बतायी दण्डी से पूर्वभावी भट्ट बाण ने भी कादम्बरी के
प्रस्तावनामय मङ्गलाचरण में अतिद्वयी कथा लिख कर ( वासदत्ता और
बृहत्कथा ) दो कथाओं की ओर संकेत किया है । उस वृहत्कथा के लेखक
गुणाढ्य के समय में महाभारत विद्यमान था । उसमें से उन्होंने रुरुमुनि कथा,
सुन्दोपसुन्द कथा, कुन्ती दुर्वासा कथा, पाण्डु द्वारा मुनि वध कथा आदि महा-
भारत से ली । इसी लिये बृहत्कथा के अनुवाद स्वरूप कथा सरित्सागर में
क्षेमेन्द्रकृत वृहत्कथा मंजरी में भी रुरुमुनि कथा १४।७५ में हे, जो महाभारत
आदि पर्व आठवें अध्याय में की हैं । सुन्दोपसुन्द कथा १५।१३५ में है जो
आदिपर्व २०१ अध्याय में है । कुन्ती दुर्वासा कथा १६।३६ में हैं जो आदिपर्व
११३।३२ में है । पाण्डु मुनिवध कथा २१।२० में है जो आदिपर्व १०८ अध्याय
में है । शकुन्तला की कथा ३२।१०८ में है जो आदिपर्व ६२ अध्याय में है !
महाभारत में ही महाभारत का रचनाकाल देखें तो अन्तरङ्ग परीक्षा
से पता चलता है कि —