काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संवत् १९१ से संवत् २१४ पर्यन्त महाराज सर्वनाथ का शासन था ।
उनका शिलालेख मिला है जिसमें 'एक लाख श्लोकों वाला महाभारत परा-
शरसुत व्यास ने बनाया' लिखा हुआ है । उक्तं च महाभारते—शतसाहस्र्यां
संहितायां परमर्षिणा पराशरसुतेन व्यासेन ।'
अब ईसवी सन् से पहले के वचन सङ्कलित किये जा रहे हैं—
वासवदत्ता में उद्धृत न्यायवार्तिककार उद्योतकर ( ४।१।२१ ) गौतम
सूत्र में महाभारत वन पर्व का श्लोक उद्धृत करते हैं :—
'अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ।
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं नरकमेव वा ॥'
( वनपर्व ३०।२८ ),
यह जीव अज्ञानी है अपने लिए सुख दुःख सम्पादित करने में स्वयं
असमर्थ है । ईश्वर की प्रेरणा से ही वह स्वर्ग और नरक जाता है ।
योगभाष्यकार पतञ्जलि अपने योगभाष्य में :—
'प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् ।
भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥
( यो० सू० १।४७ )
मीमांसाभाष्यकार शबरस्वामी ने अपने मीमांसा भाष्य ( ८।१।१ ) में
आदि पर्व का यह श्लोक उद्धृत किया है ।
'विस्तीर्य हि महज्जालमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् ।
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥
( आदिपर्व १।५१ )
ऋषियों ने विस्तार और संक्षेप में दोनों प्रकार से वर्णन किया है क्योंकि
विद्वानों को दोनों ही पद्धति प्रिय है । 'एष चाख्यानसमयः' ( नि० ७।७ )
की व्याख्या में दुर्गाचार्य लिखते हैं—'भारते आख्यानसमयः' अर्थात् महा-
भारत में यही सिद्धान्त (आख्यान की परिपाटी) स्वीकार किया गया है । (अर्थात्
पुरुष रूप वाले देवता का सिद्धान्त माना गया है ) पृथ्वी ने अपना भार हल्का