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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages
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मनुष्य का यथार्थ स्वरूप

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मिला है उन्हे जीवन्मुक्त के नाम से पुकारते है। यही जीवन्मुक्त-अवस्था लाभ करना वेदान्ती का लक्ष्य है।

एक बार मैं पश्चिमी भारत मे हिन्दमहासागर के तटवर्ती मरु-देश में भ्रमण कर रहा था। बहुत दिन तक निरन्तर पैदल भ्रमण करता रहा। किन्तु यह देख कर मुझे महान् आश्चर्य होता था कि चारों ओर सुन्दर सुन्दर झीलें हैं और झीलों के चारो ओर वृक्ष-लताएँ है और उनकी सुखद शीतल छाया जल मे पड़ रही है। कैसे अद्भुत दृश्य थे वे ! और लोग इसे रेगिस्तान कहते है ! एक मास तक वहाँ मैं घूमता रहा और प्रतिदिन ही मुझे वे सुन्दर दृश्य दिखाई दिये। एक दिन मुझे बड़ी प्यास लग रही थी और मैने सोचा कि वहाँ एक झील पर जाकर प्यास बुझा लूँ। अतएव मै इन सुन्दर निर्मल तालाबों में से एक की ओर अग्रसर हुआ। जैसे ही मैं वहाँ पहुँचा कि वह सब दृश्य न जाने कहाँ लुप्त हो गया। और तब मेरे मन मे यह ज्ञान हुआ कि 'जीवन भर जिस मरीचिका की बात पुस्तकों में पढ़ता रहा हूँ यह वही मरीचिका है।' और उसके साथ साथ यह ज्ञान भी हुआ कि 'इस पिछले मास भर प्रतिदिन मै मरीचिका ही देखता रहा हूँ, किन्तु मैने कभी न जाना कि यह मरीचिका है।' इसके बाद फिर दूसरे दिन मैने चलना प्रारम्भ किया। फिर वही सुन्दर दृश्य दिखने लगे, किन्तु उसके साथ साथ यह ज्ञान भी होने लगा कि यह सचमुच झील नहीं है, मरीचिका है। इस जगत् के सम्बन्ध में भी यही बात है। हम प्रति दिन, प्रति मास, प्रति वर्ष इस जगत् रूपी मरुस्थल मे भ्रमण कर रहे है, किन्तु मरीचिका को मरीचिका नहीं समझ पाते हैं। एक दिन यह मरीचिका अदृश्य हो जायगी, किन्तु

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फिर आ जायगी। शरीर पूर्वकृत कर्म के अधीन रहेगा इसीलिये यह मरीचिका फिर लौट आयेगी। जब तक हम कर्म से बँधे हुए है तब तक जगत् हमारे सम्मुख आयेगा ही। नर, नारी, पशु, उद्भिद, आसक्ति, कर्तव्य—सभी कुछ आयेगा किन्तु पहले की तरह हमारे ऊपर इसकी शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी नवीन ज्ञान के प्रभाव से कर्म की शक्ति का नाश होगा, उसका विष का दाँत टूट जायगा; जगत् हमारे सम्मुख एकदम बदल जायगा; कारण, जैसे जगत् दिखाई देगा वैसे ही उसके साथ सत्य और मरीचिका के भेद का ज्ञान भी आयेगा।

उस समय यह जगत् पहले का सा जगत् नहीं रहेगा। किन्तु इस प्रकार के ज्ञान की साधना मे एक विपदाशङ्का है। हम देखते है कि प्रत्येक देश मे लोग यही वेदान्त का मत ग्रहण करके कहते है, “मै धर्माधर्म से अतीत हूँ, मै विधि-निषेध से परे हूँ, अतः मेरी जो इच्छा होगी वही मै करूँगा।” इसी देश में देखो, अनेक अज्ञानी कहते रहते हैं,“मैं बद्ध नही हूँ, मे स्वयं ईश्वर स्वरूप हूँ; मेरी जो इच्छा होगी वही करूँगा।” यह ठीक नहीं है यद्यपि यह बात सच है कि आत्मा भौतिक, मानसिक और नैतिक सभी प्रकार के नियमो से अतीत है। नियम के अन्दर बन्धन हैं, नियम के बाहर मुक्ति। यह भी सच है कि मुक्ति आत्मा का जन्मगत स्वभाव है, यह उसका जन्मप्राप्त स्वत्व है और आत्मा का वास्तविक मुक्त स्वभाव भौतिक आवरण के भीतर से मनुष्य की आपातप्रतीयमान स्वतन्त्रता के रूप मे प्रतीत होता है। अपने जीवन के प्रतिक्षण में तुम अपने को मुक्त अनुभव करते हो। हम अपने को मुक्त अनुभव बिना किये एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते,

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बोल नहीं सकते और श्वास-प्रश्वास भी नहीं ले सकते। किन्तु फिर कुछ देर विचार करने पर यह भी प्रमाणित हो जाता है कि हम एक यन्त्र के समान है, मुक्त नहीं। तब कौन सी बात सत्य मानी जाय ? "हम मुक्त है" यह धारणा ही क्या-भ्रमात्मक है ? एक पक्ष कहता है कि 'मै मुक्त स्वभाव हूँ' यह धारणा भ्रमात्मक है, दूसरा पक्ष कहता है कि 'मै बद्धभावापन्न हूँ' यह धारणा ही भ्रमात्मक है। तब यह दो प्रकार की अनुभूति कहाँ से आती है ? मनुष्य वास्तव मे मुक्त है; मनुष्य परमार्थतः जो है वह मुक्त के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता, किन्तु जैसे ही वह माया के जगत् मे आता है, जैसे ही वह नामरूप के भीतर पड़ जाता है, वैसे ही वह बद्ध हो जाता है। 'स्वाधीन इच्छा' यह कहना ही भूल है। इच्छा कभी स्वाधीन हो ही नही सकती। कैसे होगी ? जो प्रकृत मनुष्य है वह जब बद्ध हो जाता है तभी उसकी इच्छा की उत्पत्ति होती है, उससे पहले नहीं।

मनुष्य की इच्छा बद्ध है, किन्तु जो इसका मूल है वह तो सदा ही मुक्त है। अतएव बन्धन की दशा मे भी, चाहे वह मनुष्य-जीवन हो, चाहे देव-जीवन हो, चाहे स्वर्ग मे हो, चाहे पृथिवी पर, फिर भी हमारे अन्दर उस विधिप्रदत्त अधिकार स्वरूप स्वतन्त्रता या मुक्ति की स्मृति रहती ही है। और जानबूझ कर या अनजाने ही हम सब इस मुक्ति की ओर अग्रसर हो रहे है। मनुष्य जब मुक्त हो जाता है तब किस प्रकार नियम मे बद्ध रह सकता है ? जगत् का कोई भी नियम उसे बाँध नहीं सकता। कारण, यह विश्वब्रह्माण्ड उसीका तो है। और वह उस समय समुदाय विश्वब्रह्माण्डस्वरूप ही

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है। चाहे हम कहें कि वही समुदय जगत् है, या कहें—उसके लिये जगत् का अस्तित्व ही नहीं है। तब उसके लिये लिंग देश आदि छोटे छोटे भाव किस प्रकार सम्भव हैं? वह कैसे कहेगा—मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं बालक हूँ? क्या यह सब मिथ्या नहीं है? उसने जान लिया है कि यह सब मिथ्या है। तब वह किस तरह कहेगा—यह पुरुष का अधिकार है, यह स्त्री का अधिकार है? किसी का कुछ अधिकार नहीं है, किसी का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। पुरुष भी नहीं है, स्त्री भी नहीं है, आत्मा लिंगहीन है, नित्यशुद्ध। मैं पुरुष या स्त्री हूँ यह कहना और मैं अमुक देशवासी हूँ यह कहना केवल मिथ्यावाद है। सभी देश मेरे हैं, समस्त जगत् मेरा है; कारण, समस्त जगत् के द्वारा मैंने मानो अपने को ढक लिया है, समस्त जगत् ही मानो मेरा शरीर हो गया है। किन्तु हम देखते हैं कि बहुत से लोग विचार करने समय ये सब बाते कह कर काम के समय सभी प्रकार के अपवित्र काम करते हैं; और यदि हम उनसे पूछे कि 'क्यों तुम ऐसा कर रहे हो' तो वे उत्तर देंगे, 'यह तुम्हारी बुद्धि का ही भ्रम है। हमारे द्वारा कोई अन्याय होना असम्भव है।' इन सब लोगों की परीक्षा करने का क्या उपाय है? उपाय यही है कि—

यद्यपि सत् और असत् दोनो एक ही आत्मा के आंशिक प्रकाश मात्र हैं तथापि असद्भाव ही आत्मा का वाह्य आवरण है, और 'सत्' भाव मनुष्य के वास्तविक स्वरूप आत्मा के अपेक्षाकृत अधिक निकट का आवरण है। जब तक मनुष्य असत् का स्तर भेद नहीं कर लेता तब तक वह सत् के स्तर पर नहीं पहुँच सकता; और जब तक वह सत् और असत् दोनों के स्तर को

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भेद नहीं करता तब तक वह आत्मा के निकट पहुँच नहीं सकता। आत्मा के निकट पहुँचने के बाद उसके लिये फिर क्या रह जाता है? अत्यन्त सामान्य कर्म, भूत जीवन के कार्य का अति सामान्य वेग ही शेष रह जाता है, किन्तु यह-वेग भी शुभ कर्मों का ही वेग है। जब तक असद्वेग एकदम समाप्त नहीं हो जाता, जब तक पहले की अपवित्रता बिलकुल दग्ध नहीं हो जाती तब तक कोई व्यक्ति सत्य का साक्षात्कार तथा प्राप्ति नहीं कर सकता। अतएव जो लोग आत्मा के निकट पहुँच गये हैं, जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है उनके केवल गत जीवन के शुभ संस्कार, शुभ वेग अवशिष्ट रह जाते हैं। शरीर मे वास करते हुए भी, एवं अनवरत कर्म करते हुए भी वे केवल सत्कर्म ही करते हैं; उनके मुख से सभी के प्रति केवल आशीर्वाद ही निकलता है, उनके हाथ केवल सत्कार्य ही करते हैं, उनका मन केवल सच्चिन्ता ही कर सकता है, उनकी उपस्थिति ही, चाहे वे कहीं भी जायँ सभी जगह मानवजाति के लिये महाकल्याण करनेवाली होती है। इस प्रकार के व्यक्ति के द्वारा क्या कोई बुरा कार्य सम्भव है? याद रखिये, 'प्रत्यक्षानुभूति' में और 'केवल मुख से कहने' में बड़ा अन्तर है! अज्ञानी व्यक्ति भी नाना प्रकार की ज्ञान की बातें कहते हैं। तोता भी इसी तरह बका करते हैं। मुँह से कहना और बात है और अनुभव करना और बात। दर्शन, मतामत, विचार, शास्त्र, मन्दिर, सम्प्रदाय आदि कोई भी बुरा नहीं है। किन्तु प्रत्यक्षानुभूति होने पर इन सब की आवश्यकता नहीं रहती। नक्शा अच्छी वस्तु है, परन्तु नक्शे मे अंकित देश स्वयं देख कर आने के बाद यदि उसी नक्शे को फिर से देखो तो कितना अन्तर दिखाई पड़ेगा! अतएव जिसने सत्य को प्रत्यक्ष कर लिया है उसे फिर

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समझने के लिये न्याय-युक्ति, तर्क-वितर्क आदि का आश्रय नहीं लेना पड़ता। उसके लिये तो सत्य अन्तरात्मा के मर्म मर्म में प्रविष्ट हो गया है—प्रत्यक्ष का भी प्रत्यक्ष हो गया है। वेदान्तियों की भाषा मे कहे तो कहेंगे कि वह उसके लिये करामलकवत् हो गया है। प्रत्यक्ष उपलब्धि करने वाले लोग निःसंकोच भाव से कह सकते हैं, 'यही आत्मा है।' तुम उनके साथ कितना ही तर्क क्यों न करो, वे तुम्हारी बात पर केवल हँसेंगे, वे उसे अण्ड बण्ड बकवास ही समझेगे। बालक चाहे कुछ भी बोले उससे वे कुछ कहते नहीं। वे तो सत्य की उपलब्धि करके भरपूर हो गये हैं। मान लो कि तुम एक देश देख कर आये हो और कोई व्यक्ति तुम्हारे पास आकर यह तर्क करने लगे कि उस देश का कहीं अस्तित्व ही नहीं है; इसी तरह वह व्यक्ति तर्क करता जाता है, किन्तु उसके प्रति तुम्हारा भाव यही होगा कि वह पागलखाने मे भेज देने के योग्य है। इसी प्रकार जो धर्म की प्रत्यक्ष उपलब्धि कर चुके हैं वे कहते हैं कि “जगत् मे धर्म सम्बन्धी जो बाते सुनी जाती हैं वे सब केवल बालको की बाते हैं। प्रत्यक्षानुभूति ही धर्म का सार है।” धर्म की उपलब्धि की जा सकती है। प्रश्न यह है कि क्या तुम इसके अधिकारी हो चुके हो ? क्या तुम्हे धर्म की वास्तव में आवश्यकता है ? यदि तुम ठीक ठीक चेष्टा करो तो तुम्हें प्रत्यक्ष उपलब्धि होगी, और तभी तुम वास्तव में धार्मिक होओगे। जब तक यह उपलब्धि तुम्हे नहीं होती तब तक तुममे और नास्तिक में कोई भेद नहीं। नास्तिक तो फिर भी निष्कपट होते हैं, किन्तु जो कहता है कि 'मैं धर्म मे विश्वास करता हूँ' और उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति की चेष्टा कभी नहीं करता वह निश्चय ही निष्कपट नहीं है।

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इसके बाद फिर प्रश्न उठता है— उपलब्धि के बाद क्या होता है ? मान लो कि हमने जगत् का यही अखण्ड भाव (हम ही एक मात्र अनन्त पुरुष है यह भाव) उपलब्ध किया; मान लो कि हमने जान लिया कि आत्मा ही एक मात्र है और वह विभिन्न रूप से प्रकाशित हो रहा है; इस प्रकार जान लेने के बाद हमारा क्या होता है ? तब क्या हम निश्चेष्ट होकर एक कोने मे बैठ कर मर जाते है ? इसके द्वारा जगत् का क्या उपकार होगा ? वही प्राचीन प्रश्न फिर घूम कर आता है ! पहले तो इसके द्वारा जगत् का उपकार होगा ही क्यों ? इसके लिये भी कोई युक्ति है ? लोगों को यह प्रश्न करने का अधिकार ही क्या है कि इससे जगत् का क्या भला होगा ? इसका अर्थ क्या है ?—छोटे छोटे बच्चे मिठाई पसन्द करते हैं। मान लो कि तुम विद्युत् के विषय मे गवेषणा कर रहे हो। वच्चा तुम से पूछता है, 'इससे क्या मिठाई खरीदी जाती है?' तुमने कहा—'नहीं।' 'तो इससे क्या लाभ ?' तत्वज्ञान की आलोचना मे व्यस्त देख कर भी लोग इसी प्रकार की जिज्ञासा करते हैं, 'इससे जगत् का क्या उपकार होगा ? क्या इससे हमें रुपया मिलेगा ?' 'नहीं।' 'तो फिर इससे क्या लाभ है ?' उपकार का अर्थ लोग इतना ही समझते हैं। तो भी धर्म की इस प्रत्यक्ष अनुभूति से जगत् का पूर्ण उपकार होता है। लोगो को भय लगता है कि जब वे यह अवस्था प्राप्त करेगे, जब उन्हे ज्ञान होगा कि सभी एक है तब उनके प्रेम का स्रोत सूख जायगा; जीवन मे जो कुछ मूल्यवान है वह सब चला जायगा; इस जीवन मे और पर जीवन मे जो कुछ भी उन्हे प्रिय है वह सब उनके लिये कुछ भी न रहेगा। किन्तु लोग यह बात एक बार सोच कर भी नहीं देखते कि जो सब व्यक्ति अपने सुख की चिन्ता की ओर से उदासीन

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९८ ज्ञानयोग

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हो गये हैं वे ही जगत् में 'सर्वश्रेष्ठ कर्मी हो गये हैं। मनुष्य तभी वास्तव मे प्रेम करता है जब वह देख पाता है कि उसके प्रेम का पात्र कोई क्षुद्र मर्त्य जीव नही है। मनुष्य तभी वास्तविक प्रेम कर सकता है जब वह देख पाता है कि उसके प्रेम का पात्र एक मिट्टी का ढेला नहीं किन्तु स्वयं भगवान् है। स्त्री स्वामी से और अधिक प्रेम करेगी यदि वह समझेगी कि स्वामी साक्षात् ब्रह्मस्वरूप हैं। स्वामी भी स्त्री से अधिक प्रेम करेगा यदि वह जानेगा कि स्त्री स्वयं ब्रह्मस्वरूप है। वे मातायें भी सन्तान से अधिक स्नेह करेंगी जो सन्तान को ब्रह्मस्वरूप देखेगी। वे ही लोग अपने महान् शत्रुओं से भी प्रेमभाव रक्खेगे जो जानेगे कि ये शत्रु साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है। वे ही लोग साधु व्यक्तियों से प्रेम करेंगे जो समझेगे कि साधु व्यक्ति साक्षात् ब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही लोग अत्यन्त असाधु व्यक्तियो से भी प्रेम करेंगे जो यह जान लेगे कि इन महा दुष्टों के भी पीछे वही प्रभु विद्यमान है। जिनका क्षुद्र अहंकार एकदम मर चुका है और उसके स्थान पर ईश्वर ने अधिकार जमा लिया है वे ही लोग जगत् को इशारे पर चला सकते है। उनके लिये समस्त जगत् दूसरा ही रूप धारण कर लेता है। दुःखकर अथवा क्लेशकर जो कुछ भी है वह सब उनकी दृष्टि में चला जाता है; सभी प्रकार का गोलमाल और द्वन्द्व मिट जाता है। उनके लिये जगत् उस समय कारागार स्वरूप न रह कर (जहाँ हम प्रतिदिन एक टुकड़ा रोटी के लिये झगड़ा, मारपीट करते हैं) हमारे क्रीडाक्षेत्र के रूप में बदल जायगा। उस समय जगत् बड़े ही सुन्दर रूप में परिणत हो जायगा। इसी प्रकार के व्यक्ति को यह कहने का अधिकार है कि—'यह जगत् कितना सुन्दर है!' उन्हीं को यह कहने का भी अधिकार है कि सभी मंगल स्वरूप है। इस प्रकार की

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प्रत्यक्ष उपलब्धि होने से जगत् का यह महान् हित होगा कि जगत् का यह सब विवाद, गोलमाल सब दूर होकर शान्ति का राज्य होगा। यदि जगत् के सभी मनुष्य आज इस महान् सत्य के एक बिन्दु की भी उपलब्धि कर सकें तो उनके लिये यह समस्त जगत् एक दूसरा ही रूप धारण कर लेगा और यह सब गोलमाल समाप्त हो कर शान्ति का राज्य आ जायगा। यह घिनौनी तथा अमानुषिक जल्दबाज़ी, यह स्पर्धा, जो हमें अन्य सभी के आगे बढ़ निकलने के लिये बाध्य करती है, इस संसार से उठ जायगी। इसके साथ साथ सब प्रकार की अशान्ति, घृणा, ईर्ष्या एवं सभी प्रकार का अशुभ सदा के लिये चला जायगा। उस समय देवता लोग इसी जगत् मे वास करेंगे। उस समय यही जगत् स्वर्ग हो जायगा। और जब देवता देवता में खेल होगा, देवता का देवता से कार्य होगा, देवता देवता में प्रेम होगा तब क्या अशुभ ठहर सकता है ? ईश्वर की प्रत्यक्ष उपलब्धि का यही एक बड़ा सुफल है। समाज मे आप जो कुछ भी देखते है वह सभी उस समय परिवर्तित होकर एक दूसरा रूप धारण कर लेगा। तब आप मनुष्य को खराब समझ कर नही देखेगे; यही प्रथम महालाभ है। उस समय आप लोग किसी अन्य अन्याय कार्य करने वाले दरिद्र नर-नारी की ओर घृणापूर्वक दृष्टिपात नहीं करेगे। हे महिलागण, फिर आप, जो दुखिया कामिनी रात भर रास्ते मे भटकती फिरती है, उसके प्रति घृणा पूर्वक दृष्टिपात न करेगी; कारण, आप वहाँ भी साक्षात् ईश्वर को देखेगी। तब आप मे ईर्ष्या अथवा दूसरों पर शासन करने का भाव उदय नहीं होगा; यह सब चला जायगा उस समय प्रेम इतना प्रबल हो जायगा कि मानव जाति को सत्पथ पर चलाने के लिये फिर चाबुक की आवश्यकता नहीं रहेगी।

१०० ज्ञानयोग

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१०० ज्ञानयोग

यदि संसार के नरनारियों के लाखवें भाग का एक भाग भी बिल्कुल चुप रह कर एक क्षण के लिये भी कहे,—" तुम सभी ईश्वर हो; हे मानवगण, हे पशुओ, हे सभी प्रकार के जीवित प्राणियो ! तुम सभी एक जीवन्त ईश्वर के प्रकाश हो, " तो आधे घण्टे के अन्दर ही समस्त जगत् का परिवर्तन हो जायगा। उस समय चारों ओर घृणा का बीज न फैला कर, ईर्ष्या और असत् चिन्ता का प्रवाह न फैला कर सभी देशो के लोग सोचेंगे कि सभी 'वह' है। जो कुछ तुम देख रहे हो या अनुभव कर रहे हो, वह सब वही है। तुम्हारे भीतर अशुभ न रहने पर तुम अशुभ किस तरह देखोगे ? तुम्हारे भीतर ही यदि चोर नहीं है तो तुम किस प्रकार चोर को देखोगे ? तुम स्वयं यदि खूनी नहीं हो तो किस प्रकार खूनी को देख सकते हो ? साधु हो जाओ, तो असाधुभाव तुम्हारे अन्दर से एक दम चला जायगा। इसी प्रकार समस्त जगत् का परिवर्तन हो जायगा, यही समाज का महान् लाभ है। मनुष्य के पक्ष मे यह महान् लाभ है। इन्हीं सब भावों को भारत मे प्राचीन काल मे अनेक महात्माओ ने आविष्कृत और कार्य रूप मे परिणत किया था। किन्तु आचार्यों की संकीर्णता तथा देश की पराधीनता आदि कारणो से यह सब चिन्ता चारो ओर प्रचार न पा सकी। ऐसा होने पर भी ये सब महान् सत्य है। जहाँ भी इन विचारों का प्रभाव पड़ा है वही मनुष्य ने देवत्व को प्राप्त किया है। इसी प्रकार के एक देवतास्वरूप मनुष्य के द्वारा मेरा समस्त जीवन परिवर्तित हो गया है; इस सम्बन्ध मे आगामी रविवार को मैं आप से कुछ कहूँगा। इस समय यही सब भाव जगत् मे प्रचार करने का समय आ गया है। मठों मे आबद्ध न रह कर, केवल पण्डितो के पढ़ने के लिये दार्शनिक पुस्तक-समूह मे आबद्ध न रह

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मनुष्य का यथार्थ स्वरूप १०१

कर, केवल कुछ सम्प्रदायों के अथवा कुछ पण्डितों के एकमात्र अधिकार मे न रह कर इसका समस्त जगत् मे प्रचार होगा जिससे यह साधु, पापी, आबालवृद्धवनिता, शिक्षित, अशिक्षित सभी की साधारण सम्पत्ति हो सके। तब ये सब भाव जगत् की वायु मे खेलेगे और हम जो वायु श्वास-प्रश्वास द्वारा ले रहे है वह प्रत्येक ताल पर बोलेगी—'तत्त्वमसि', यह असंख्य चन्द्र-सूर्य-पूर्ण ब्रह्माण्ड वाक्योच्चारण करने वाले प्रत्येक पदार्थ के भीतर से बोल उठेगा—'तत्त्वमसि'!


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५. माया और ईश्वरधारणा

का

क्रमविकास

हमने देखा कि अद्वैत वेदान्त की एक मूलभित्ति स्वरूप माया-वाद अस्पष्ट रूप से संहिताओं मे भी देखा जाता है, और उपनिषदो मे जिन तत्त्वों को खूब परिस्फुट रूप मिल गया है वे सभी संहिताओं मे अस्पष्ट रूप से किसी न किसी आकार मे विद्यमान है। आप मे से बहुत से लोग अब मायावाद के तत्त्व को सम्पूर्ण रूप से समझ गये होंगे या समझ सकेंगे; प्रायः लोग भ्रान्तिवशतः माया को 'भ्रम' कह कर व्याख्या करते हैं, अतएव वे जब जगत् को माया कह कर पुकारते है तब उसे भी भ्रम ही कह कर व्याख्या करनी पड़ेगी। माया को 'भ्रम' के अर्थ मे लेना ठीक नहीं है। माया कोई विशेष मत नहीं है, वह तो केवल विश्वब्रह्माण्ड के स्वरूप का वर्णन मात्र है। उसी माया को समझने के लिये हमे संहिता तक जाना पडेगा और प्रथम माया का क्या अर्थ था, उसके सम्बन्ध मे क्या धारणा थी यह भी देखना पड़ेगा। हम देख चुके हैं, लोगों मे देवताओ का ज्ञान किस रूप मे आया। हमे समझना होगा कि ये 'देवता पहले केवल शक्तिशाली पुरुष मात्र थे। आप लोगों मे से बहुत से यह पढकर कि ग्रीक, हिब्रू, पारसी अथवा अन्य जातियों के प्राचीन शास्त्रों में देवता लोग हमारी दृष्टि मे जो सब कार्य अत्यन्त घृणित है वे करते थे,

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माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १०३

भयभीत हो जाते है; किन्तु हम एक दम भूल जाते हैं कि हम लोग उन्नीसवी शताब्दी के हैं और देवता अनेक सहस्र वर्ष पहले के जीव थे; और हम यह भी भूल जाते हैं कि इन सब देवताओं के उपासक लोग उनके चरित्र मे कुछ भी असंगत देख नही पाते थे और वे जिस प्रकार से उन देवताओ का वर्णन करते थे उससे उन्हें कुछ भी भय नही होता था, कारण वे सब देवता उन्ही के समान थे। हम लोगो को आजीवन यह बात सीखनी होगी कि प्रत्येक व्यक्ति के बारे मे उसी के आदर्शों के अनुसार विचार करना होगा, दूसरो के आदर्शों के अनुसार नही। ऐसा न करके हम दूसरों को अपने आदर्शों की दृष्टि से देखते है। यह ठीक नहीं। हमारे आसपास रहने वाले सभी लोगो के साथ व्यवहार करने मे हम सदा यही भूल करते है, और मेरे मतानुसार, दूसरों के साथ हमारा जो कुछ भी वाद-विवाद होता है वह सब इसी एक कारण से होता है कि हम दूसरो के देवता को अपने देवता के द्वारा, दूसरों के आदर्शों को अपने आदर्शों के द्वारा और दूसरो के उद्देश्य को अपने उद्देश्य के द्वारा विचार करने की चेष्टा करते है। विशेष विशेष अवस्थाओ में हो सकता है कि मैं कोई विशेष कार्य करूँ, और जब मै देखता हूँ कि अन्य व्यक्ति वही कार्य कर रहा है तो मै सोच लेता हूँ कि उसका भी वही उद्देश्य है; मेरे मन मे यह बात एक बार भी नहीं उठती कि यद्यपि फल एक हो सकता है तथापि भिन्न भिन्न सहस्रो कारण वही एक फल उत्पन्न कर सकते है। मै जिस कारण से उस कार्य को करने मे प्रवृत्त होता हूँ, अन्य सब लोग उसी कार्य को अन्य उद्देश्यों से कर सकते है। अतएव इन सब प्राचीन धर्मों के ऊपर विचार करते समय हम जिस भाव से दूसरो के सम्बन्ध मे सोचते है वैसा न करें

१०४ ज्ञानयोग

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१०४ ज्ञानयोग

वरञ्च हम अपने को प्राचीन समय के लोगों की स्थिति में रख कर विचार करे।

ओल्ड टेस्टामेण्ट (Old Testament) में निष्ठुर जिहोवा के वर्णन से बहुत से लोग भयभीत हो उठते हैं, परन्तु क्यों ? लोगों को यह कल्पना करने का क्या अधिकार है कि प्राचीन यहूदियों का जिहोवा हमारी कल्पना के ईश्वर के समान होगा ? और हमे यह भी न भूलना चाहिये कि हमारे बाद जो लोग आयेगे वे जिस तरह प्राचीन धर्म या ईश्वर की धारणा के ऊपर हँसते है उसी तरह वे हमारे धर्म अथवा ईश्वर की धारणा के ऊपर हँसेगे। यह सब होने पर भी इन सब विभिन्न ईश्वर सम्बन्धी धारणाओं का संयोग करने वाला एक स्वर्णसूत्र है और वेदान्त का उद्देश्य है इस सूत्र का आविष्कार करना। भगवान् कृष्ण ने कहा है—"भिन्न भिन्न मणियाँ जिस प्रकार एक सूत्र में गुँथी हुई रहती हैं उसी प्रकार इन सब विभिन्न भावों के भीतर भी एक सूत्र रहता है।" और आज कल की धारणाओं के अनुसार यह कितना ही वीभत्स, भयानक अथवा अरुचिकर क्यों न मालूम पड़े, वेदान्त का कर्तव्य इन सभी धारणाओं तथा सभी वर्तमान धारणाओं के भीतर इस संयोगसूत्र का आविष्कार करना है। प्राचीन काल की अवस्था को लेकर विचार करने पर वे विचार अधिक संगत मालूम पडते है और ऐसा लगता है कि हमारी सभी धारणाओं से अधिक वीभत्स वे नहीं थीं। उनकी वीभत्सता हमारे सामने तभी प्रकाशित होती है जब हम उस प्राचीन समाज की अवस्था और लोगों के नैतिक भाव को, जिनके भीतर इन सब देवताओं का भाव विकसित हुआ था, उनसे पृथक करके देखते हैं। कारण, प्राचीन काल

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माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १०५

की सामाजिक अवस्था आजकल नहीं है। जिस प्रकार प्राचीन यहूदी आज के तीक्ष्णबुद्धि यहूदी मे परिणत हो गया है, जिस प्रकार प्राचीन आर्य आज के बुद्धिमान हिन्दू मे परिणत हो गया है उसी प्रकार जिहोवा की और देवताओं की भी क्रमोन्नति हुई है। हम इतनी ही भूल करते है कि हम उपासक की क्रमोन्नति तो स्वीकार करते हैं, परन्तु ईश्वर की नहीं। उपासकों की उन्नति के नाम पर हम उनकी जो प्रशंसा करते हैं उसे भी ईश्वर को हम देना नहीं चाहते। तात्पर्य यह कि हम तुम जिस प्रकार किसी विशेष भाव के प्रकाशक होने के कारण उस भाव की उन्नति के साथ साथ उन्नत होते है, उसी प्रकार देवता भी विशेष विशेष भाव के द्योतक होने के कारण भाव की उन्नति के साथ साथ उन्नत होते है। आप शायद यही आश्चर्य करेगे कि देवता और ईश्वर की भी कही उन्नति होती है? तो हम भी कह सकते हैं कि मनुष्य की भी उन्नति होती है क्या? आगे चलकर हम देखेंगे कि इस मनुष्य के भीतर जो प्रकृत मनुष्य है वह अचल, अपरिणामी, शुद्ध और नित्यमुक्त है। जिस प्रकार यह मनुष्य उस वास्तविक मनुष्य की छाया मात्र है उसी प्रकार हमारी ईश्वर-धारणाएँ केवल हमारे मन की सृष्टि है—वे उसी प्रकृत ईश्वर का आंशिक प्रकाश, आभास मात्र है। इस समस्त आंशिक प्रकाश के पीछे प्रकृत ईश्वर है और वह नित्य शुद्ध, अपरिणामी है। किन्तु यह सब आंशिक प्रकाश सर्वदा ही परिणामशील है—वे उनके अन्तरालस्थ सत्य की क्रमाभिव्यक्ति मात्र है; वही सत्य जब अधिक परिमाण मे अभिव्यक्त होता है तब उसे उन्नति और जब उसका अधिकांश आवृत या अनभिव्यक्त रहता है तब उसे अवनति कहते हैं। इसी प्रकार जैसे हमारी उन्नति होती है वैसे ही देवताओ की भी होती है।

१०६ ज्ञानयोग

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१०६ ज्ञानयोग

सीधे ढंग से कहे तो जिस प्रकार हमारी उन्नति होती है, जिस प्रकार हमारा स्वरूप प्रकाशित होता है उसी प्रकार देवता भी अपना स्वरूप प्रकाशित करते रहते हैं।

अब हम मायावाद को समझ सकेगे। संसार के सभी धर्मों ने इस प्रश्न को उठाया है—संसार मे इतना असामञ्जस्य क्यों है ? संसार मे इतना अशुभ क्यों है ? किन्तु हम धर्मभाव के प्रथम आविर्भाव के समय इस प्रश्न को उठते नही देखते; इसका कारण यह है कि शायद आदि मनुष्य को जगत् का असामञ्जस्य दिखाई नहीं पड़ता था, उसके चारों ओर कोई असामञ्जस्य नही था, किसी प्रकार का मतविरोध नही था, भले बुरे की कोई प्रतिद्वन्द्विता नहीं थी। केवल उसके हृदय में दो वस्तुओ का संग्राम हो रहा था। एक कहती थी—यह करो, और दूसरी उसी को करने का निषेध करती थी। प्राथमिक मनुष्य भावनाओं के दास थे। उनके मन मे जो आता था वे वही करते थे। वे इन भावनाओं के सम्बन्ध मे विचार करने तथा उनका संयम करने की चेष्टा बिलकुल ही नहीं करते थे। इन सब देवताओं के सम्बन्ध मे भी यही बात है; ये लोग भी उपस्थित प्रवृत्तियों के आधीन थे। इन्द्र आये और उन्होंने दैत्यबल को छिन्न भिन्न कर दिया। जिहोवा किसी के प्रति सन्तुष्ट थे तो किसी से रुष्ट थे, क्यो, यह कोई भी नहीं जानता था, जानना भी नही चाहता था। इसका कारण, उस समय अनुसन्धान की प्रवृत्ति ही लोगो मे नहीं जागी थी, इसलिये वे जो कुछ भी करते थे वही ठीक था। उस समय भले बुरे की कोई धारणा ही नहीं थी। हम जिन्हे बुरा कहते हैं ऐसे बहुत से कार्य देवता लोग करते थे; हम वेदो मे

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माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १०७

देखते है, इन्द्र तथा अन्य देवता अनेक बुरे कार्य करते थे, किन्तु इन्द्र के उपासकों की दृष्टि मे पाप या बुरा काम कुछ भी नहीं था, इसलिये वे इस सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं करते थे।

नैतिक भाव की उन्नति के साथ साथ मनुष्य के मन में एक युद्ध प्रारम्भ हुआ; मनुष्य के अन्दर मानों एक नई इन्द्रिय का आविर्भाव हुआ। भिन्न भिन्न भाषाओं और भिन्न भिन्न जातियो ने इसको भिन्न भिन्न नाम दिये; कोई कहते है यह ईश्वरी वाणी है, कोई कहते हैं वह पहले की शिक्षा का फल है। जो भी हो, उसने प्रवृत्तियो को दमन करने वाली शक्ति के रूप में काम किया। हमारे मन की एक प्रवृत्ति कहती है, यह काम करो, दूसरी कहती है, मत करो। हमारे भीतर कितनी ही प्रवृत्तियाँ है जो इन्द्रियों के द्वारा बाहर जाने की चेष्टा करती रहती है। और उनके पीछे चाहे कितना ही क्षीण क्यो न हो, और एक स्वर कहता है—बाहर मत जाना। इन दो बातो के संस्कृत नाम है प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति ही हमारे सभी कर्मों का मूल है। निवृत्ति से धर्म की उत्पत्ति है। धर्म आरम्भ होता है–इस “ मत करना ” से; आध्यात्मिकता भी इस “ मत करना ” से ही आरम्भ होती है। जहाँ यह “ मत करना ” नहीं है वहाँ धर्म का आरम्भ ही नहीं हुआ ऐसा समझो। यह जो “ मत करना ” है, यहीं निवृत्ति का भाव आगया। और निरन्तर युद्ध मे रत पाशवीप्रकृति देवताओ के वावजूद भी मनुष्य की धारणा उन्नत होने लगी।

अब मनुष्य के हृदय मे प्रेम ने प्रवेश किया। अवश्य ही इसकी मात्रा बहुत थोड़ी थी और आज भी यह मात्रा

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१०८ ज्ञानयोग

अधिक बढ़ी नहीं है। पहले पहल यह प्रेम जाति तक सीमित रहा। ये सब देवता केवल अपने सम्प्रदाय मात्र से प्रेम करते थे। प्रत्येक देवता एक जातीय देवमात्र था, केवल उसी जाति-विशेष का रक्षक मात्र था। और जिस प्रकार भिन्न भिन्न देशों के विभिन्न वंशीय लोग अपने को उस एक विशेष पुरुष का वंशज कहते हैं जो उस वंश के प्रतिष्ठाता होते हैं, उसी प्रकार कभी कभी किसी जाति के लोग अपने के एक देवता का वंशधर समझते थे। प्राचीन काल में अनेक जातियाँ थीं और आज भी हैं जो अपने को चन्द्रवंशी या सूर्यवंशी कहती हैं। संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थो मे आपने बड़े बड़े सूर्यवंशी वीर सम्राटो की कथाये पढ़ी होगी। ये लोग पहले चन्द्र-सूर्य के उपासक थे; बाद मे ये अपने को चन्द्र और सूर्य का वंशज कहने लगे। अतः जब यह जातीय भाव आने लगा तब किंचित् प्रेम जागा, परस्पर एक दूसरे के प्रति एक कर्त्तव्य-भाव भी आया और कुछ सामाजिक शृंखला की उत्पत्ति हुई; और इसी के साथ साथ यह भावना भी आने लगी कि हम एक दूसरे का दोष सहन या क्षमा बिना किये कैसे एक साथ रह सकेगे ? मनुष्य किस प्रकार अन्ततः कभी न कभी अपनी प्रवृत्तियो का बिना संयम किये दूसरो के साथ, यहाँ तक कि एक व्यक्ति के साथ भी रह सकता है ? यह असम्भव है। इसी प्रकार संयम की भावना आयी। इसी सयम की भावना में सम्पूर्ण समाज गुँथा हुआ है, और हम जानते हैं कि जो नर-नारी इस सहिष्णुता या क्षमा रूपी शिक्षा से रहित हैं वे अत्यन्त कष्ट में जीवन बिता रहे हैं।

अतएव जब इस प्रकार धर्म का भाव आया तब मनुष्य के मन मे एक उच्चतर अपेक्षाकृत अधिक, नीतिसंगत भाव का आभास -

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माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १०९

आया। तब वे अपने उन्हीं प्राचीन देवताओं में—चञ्चल, लड़ाकू, शराबी, गोमांसाहारी देवताओं मे—जिनको जले मांस की गन्ध से और तीव्र सुरा की आहुति से ही परम आनन्द होता था—कुछ असंगति देखने लगे। दृष्टान्त स्वरूप देखिये—वेद में वर्णन आता है कि कभी कभी इन्द्र इतना मद्यपान कर लेता था कि वह बेहोश होकर गिर पडता था और अण्ड बण्ड बकने लगता था। इस प्रकार के देवताओं मे लोगों का विश्वास स्थापित रखना अब असम्भव हो गया। तब सभी के उद्देश्यों की खोज आरम्भ हो गई थी और देवताओं के कार्यों के उद्देश्य भी पूछे जाने लगे। अमुक देवता-के अमुक कार्य का क्या उद्देश्य है? कोई उद्देश्य नहीं मिला। अतएव लोगो ने उन सब देवताओं का त्याग कर दिया, अथवा वे देवताओ के विषय मे और भी उच्च धारणाये बनाने लगे। उन्होने देवताओं के उन सब गुणों तथा कार्यों को, जिन्हे वे समझ सकते थे या अच्छा समझते थे, एकत्रित किया और जिन कार्यों को उन्होने अच्छा नही समझा अथवा समझा ही नहीं, उन्हे भी अलग कर दिया; और इनमें से जो अच्छे कार्यों का समूह था उसे उन्होंने 'देव-देव' नाम दिया। तब उनके उपास्य देवता केवल शक्ति के परिचायक मात्र नही रहे, शक्ति से अधिक और भी कुछ उनके लिये आवश्यक होगया। अब वे नीतिपरायण देवता हो गये; वे मनुष्यों से प्रेम करने लगे, मनुष्यों का हित करने लगे। किन्तु देवता सम्बन्धी धारणा फिर भी अक्षुण्ण रही। वे लोग देवता की नीतिपरायणता तथा शक्ति को ही बढा सके। अब विश्व मे वे एक देवता सर्वश्रेष्ठ नीतिपरायण तथा एक प्रकार से सर्वशक्तिमान पुरुष माने जाने लगे।

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११० ज्ञानयोग

किन्तु यह जोड़-गाँठ कब तक चल सकती है ? जिस प्रकार जगत् के रहस्य की व्याख्या सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती गई उसी प्रकार यह रहस्य मानों और भी रहस्यमय होता गया। देवता अथवा ईश्वर के गुण जिस प्रकार समयुक्तान्तर श्रेणी (Arithmetical progression) के नियम से बढ़ने लगे उसी प्रकार सन्देह भी समगुणितान्तर श्रेणी (Geometrical progression) के नियम से बढ़ने लगे। निष्ठुर जिहोवा के साथ जगत् का सामञ्जस्य स्थापित करने मे जो कठिनता होती थी उससे अधिक कठिनता होने लगी ईश्वरसम्बन्धी नवीन धारणा के साथ जगत् का सामञ्जस्य स्थापित करने में। सर्वशक्तिमान और प्रेममय ईश्वर के राज्य मे ऐसी पैशाचिक घटनाये क्यों घटती हैं ? सुख की अपेक्षा दुःख इतना अधिक क्यों है ? साधु भाव जितना है, असाधुभाव उससे अधिक क्यों है ? जगत् में कुछ भी खराबी नहीं है ऐसा समझ कर हम आँखे बन्द करके बैठे रह सकते है; किन्तु इससे जगत् की वीभत्सता में तो कुछ परिवर्तन होता नही। यदि इसे हम बहुत अच्छे शब्दों में कहे तो कह सकते है कि यह जगत् टैण्टालस के नरक* के समान है; उससे यह किसी अंश मे उत्कृष्ट नहीं। प्रबल प्रवृत्तियाँ, इन्द्रियों को चरितार्थ करने की सभी वासनायें विद्यमान हैं, परन्तु उनकी पूर्ति करने का उपाय नहीं है। हमारी इच्छा के विरुद्ध हमारे अन्दर एक


* ग्रीक लोगों की एक पौराणिक कथा है कि टैण्टालस नामक राजा पाताल के एक तालाब में गिर गया था। तालाब का जल उसके होठों तक आता था, परन्तु जैसे ही वह अपनी प्यास बुझाने का प्रयत्न करता था वैसे ही जल कम हो जाता था। उसके सिर के ऊपर नाना प्रकार के फल लटकते थे, और जैसे ही वह इन्हें खाना चाहता था वे ग़ायब हो जाते थे।