ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in context५. माया और ईश्वरधारणा
का
क्रमविकास
हमने देखा कि अद्वैत वेदान्त की एक मूलभित्ति स्वरूप माया-वाद अस्पष्ट रूप से संहिताओं मे भी देखा जाता है, और उपनिषदो मे जिन तत्त्वों को खूब परिस्फुट रूप मिल गया है वे सभी संहिताओं मे अस्पष्ट रूप से किसी न किसी आकार मे विद्यमान है। आप मे से बहुत से लोग अब मायावाद के तत्त्व को सम्पूर्ण रूप से समझ गये होंगे या समझ सकेंगे; प्रायः लोग भ्रान्तिवशतः माया को 'भ्रम' कह कर व्याख्या करते हैं, अतएव वे जब जगत् को माया कह कर पुकारते है तब उसे भी भ्रम ही कह कर व्याख्या करनी पड़ेगी। माया को 'भ्रम' के अर्थ मे लेना ठीक नहीं है। माया कोई विशेष मत नहीं है, वह तो केवल विश्वब्रह्माण्ड के स्वरूप का वर्णन मात्र है। उसी माया को समझने के लिये हमे संहिता तक जाना पडेगा और प्रथम माया का क्या अर्थ था, उसके सम्बन्ध मे क्या धारणा थी यह भी देखना पड़ेगा। हम देख चुके हैं, लोगों मे देवताओ का ज्ञान किस रूप मे आया। हमे समझना होगा कि ये 'देवता पहले केवल शक्तिशाली पुरुष मात्र थे। आप लोगों मे से बहुत से यह पढकर कि ग्रीक, हिब्रू, पारसी अथवा अन्य जातियों के प्राचीन शास्त्रों में देवता लोग हमारी दृष्टि मे जो सब कार्य अत्यन्त घृणित है वे करते थे,