जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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बोधिसत्त्व ने यह देख कहा—एक कर्त्तव्य-निष्ठ आदमी के कारण इतने
तपस्वियों का बिना फल-मूल के लिए गए गुज़ारा चलता है। प्रयत्न करना
ही चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—
वायमेथेव पुरिसो न निब्बिन्देय्य पण्डितो,
वायामस्स फल पस्स भुत्ता अम्बा अनीतिह ॥
[ आदमी को चाहिए कि प्रयत्न अवश्य करे। पण्डित आदमी विमुख
न हो। प्रयत्न के फल को देखो—आम प्रत्यक्ष खाने को मिले।]
संक्षिप्तार्थ—पण्डितो, अपने कर्तव्य की पूर्ति में वायमेथेव, विमुख न हो।
क्यो ? प्रयत्न के कभी निष्फल न होने के कारण। बोधिसत्त्व ने 'प्रयत्न सफल
होता ही है' ऋषियो को इस प्रकार सम्बोधन करते हुए कहा वायामस्स फल
पस्स। कैसा ? भुत्तो अम्बा अनीतिह, अम्ब, कहने के लिए है, मतलब है
नाना प्रकार के फल लाए गए, आम उनम श्रेष्ठ होने से अम्ब कहा गया।
यह जो पांच सौ ऋषियो ने स्वय जगल न जा एक के लिए आए फला को खाया,
सो यह प्रयत्न का ही फल है। ओर यह अनीतिह। इति ह (आप्त) इतिहास
से। इतिह से ही ग्रहण करना नही होता, उस फल को प्रत्यक्ष देखो।
बोधिसत्त्व ने ऋषियो को उपदेश दिया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का
कर्तव्य-निष्ठ तपस्वी यह भिक्षु था। गण-शास्ता में ही था।