जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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लोगो ने उसकी कर्तव्य-निष्ठा पर प्रसन्न हो, उसे पाँच सौ स्थिर निमन्त्रण
दिए। बहुत लाभ-सत्कार की प्राप्ति हुई। उसके कारण बहुता को सुख
मिला। धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षुओ ने बात चलाई—'आयुष्मानो ! उस
भिक्षु ने अपनी कर्तव्य निष्ठा से बहुत लाभ-सत्कार प्राप्त किया। इस एक
के कारण बहुतो को सुख मिला।
शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
'यह बातचीत' कहने पर "भिक्षुओ, केवल अभी नही, पहले भी यह भिक्षु
कर्तव्य निष्ठ रहा है। इस अकेले के कारण पाँच सौ ऋषि फल-फूल के लिए
न जाकर इस एक के द्वारा मँगवाए गए फलो से ही गुजारा चलाते रहे हैं।"
यह कह पूर्वजन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण कुल में पैदा हो सयाने होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से
प्रव्रजित हो पाँच सौ ऋषियो के साथ पर्वत के नीचे रहने लगे। उस समय
हिमालय प्रदेश में बडी गर्मी पडी। जहाँ तहाँ पानी सूख गया। पशु पानी
न मिलने से कष्ट पाने लगे।
उन तपस्वियो में से एक तपस्वी ने उन (पशुओ) के प्यास-कष्ट को देख
एक वृक्ष काट, उसमें से एक द्रोणि बना, पानी उलीच कर द्रोणि भर, उन्हें पानी
दिया। बहुत से पशुओ के इकट्ठे होकर पानी पीने लगने पर तपस्वी को
फल-मूल लाने के लिए जाने का समय न मिला। वह निराहार रहकर भी पानी
पिलाता ही रहा।
पशुओं ने सोचा यह हमें पानी पिलाने के कारण फल-मूल के लिए जाने
का समय नही पाता। निराहार रहने के कारण बहुत कष्ट पाता है। हम लोग
एक निर्णय करें। उन्होने सलाह की कि इसके बाद जो पानी पीने आए वह
अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ फल-मूल अवश्य लाए।
उसके बाद प्रत्येक पशु अपनी अपनी शक्ति के अनुसार मीठे मीठे आम,
जामुन, कटहल आदि अवश्य लाता। उसके लिए लाया हुआ फल ढाई गाडियाँ
भर होता। पाँच सौ तपस्वी उसे ही खाते। अधिक होता, छोड़ देते।