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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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२६ [ १.१२.११५
बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च उभो जाले अबज्झरे,
मितचिन्ती प्रमोचेसि उभो तत्थ समागता ॥
[बहुचिन्ती और अप्पचिन्ती दोनो जाल में फँस गए। मितचिन्ती
ने दोनो को छुड़ा दिया। ये दोनो उसके साथ आ गए ।]
बहुचिन्ती, बहुत चिन्तन करनेवाला होने से अथवा बहुत सङ्कल्प-विकल्प
वाला होने से बहुचिन्ती नाम हुआ। बाकी दोनो भी इसी प्रकार हैं। उभो
तत्थ समागता, मितचिन्ती के कारण प्राण बचाकर वे दोनो फिर पानी मे
मितचिन्ती के साथ आ गए।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यो को प्रकाशित कर
जातक का मेल बैठाया। (आर्य-) सत्यो की समाप्ति पर स्थविर भिक्षु
श्रोतापन्न हुए।
उस समय के बहुचिन्ती और अल्प-चिन्ती यह दोनो थे, मितचिन्ती तो मै
ही था।
११५. अनुसासिक जातक
“यायञ्चमनुसासति .” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय एक उपदेश देनेवाली भिक्षुणी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह श्रावस्ती-निवासिनी एक कुल में उत्पन्न हुई थी। जिस समय से
प्रव्रजित होकर उपसम्पन्न हुई, उस समय से लेकर वह श्रमण-धर्म मे न लग