जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 48 of 479
Read in contextअनुसासिक ] २७
चीजो की लोभी होने से नगर के एक ऐसे हिस्से मे जहां दूसरी भिक्षुणियां नही
जाती थी, भिक्षा मांगने जाती । मनुष्य उसे बढ़िया भोजन देते । उसने रस
तृष्णा के कारण सोचा, यदि दूसरी भिक्षुणियां भी उसी ओर भिक्षा मांगने
जाएंगी, तो मेरी प्राप्ति मे फरक पडेगा। इस लिए मुझे ऐसा करना चाहिए,
जिसमे दूसरी भिक्षुणियां उधर भिक्षा मांगने न जाएं ।
वह भिक्षुणियो के निवास-स्थान पर गई और बोली—बहनो ! अमुक
जगह पर चण्ड-हाथी है, चण्ड-घोडा है, चण्ड-कुत्ता है। वह खतरनाक जगह
हैं। वहाँ पिण्ड-पात के लिए मत जाएं। उसकी बात सुन एक भिक्षुणी ने
भी उधर गर्दन निकालकर नही देखा।
उसके एक दिन उधर भिक्षा माँगने के समय, जब वह जल्दी से एक घर
मे घुसने जा रही थी एक मरखने मेढे ने उसे टक्कर मारकर उसकी जांघ की
हड्डी तोड दी । मनुष्यो ने दौडकर उस दो टुकडे हुए जांघ की हड्डी को एक में
बाँधा और उसे चारपाई पर लिटाकर भिक्षुणी आश्रम लाए। 'यह दूसरी भिक्षु-
णियो को उपदेश देती थी, स्वय उधर जाकर जांघ की हड्डी तुडाकर आई है'
कह भिक्षुणियो ने हंसी उडाई। यह बात शीघ्र ही भिक्षु-सघ तक पहुँच गई।
एक दिन धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु उसकी निन्दा कर रहे थे—आयु-
ष्मानो ! दूसरो को उपदेश देनेवाली भिक्षुणी स्वय उधर जाकर मरखने मेंढे
से जांघ की हड्डी तुडा लाई है।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?'
'यह बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नही, पहले भी यह दूसरो को
तो उपदेश देती रही है, लेकिन स्वय तदनुसार आचरण न करने के कारण दुख
भोगती रही है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे वाराणसी मे राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि-
सत्व जगल मे पक्षी की योनि म जन्म ग्रहण कर बडे होने पर सैकडो पक्षियो को
ले हिमालय को गए। उनके वहीं रहते समय चण्ड-स्वभाव की एक चिडिया
राज-मार्ग में जाकर पडी रहती, वहाँ उसे गाडियो पर से गिरे हुए धान, मूँग
आदि के दाने मिलते। उन्हे पाकर वह सोचती कि अब ऐसा उपाय करूँ जिससे