Skip to content
SarvaKosh
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 46 of 479

Read in context
Page 46

मितचिन्ती ] २५
का स्वभाव भिक्षुओ पर प्रगट हो गया। भिक्षुओ ने धर्म सभा मे उन स्थविरो
के आलसी स्वभाव की चर्चा चलाई। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ,
इस समय बैठे क्या बात कर रहे थे ?" "यह बातचीत" कहने पर उन स्थविरो
को बुलवाकर पूछा—
"भिक्षुओ, क्या तुम सचमुच आलसी हो ?"
"भन्ते ! सचमुच ।"
"भिक्षुओ ! न केवल अभी आलसी हो, पूर्वजन्म में भी आलसी ही थे
और निवास-स्थान के प्रति मोह था" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय
वाराणसी नदी में तीन मच्छ थे। उनके नाम थे बहुचिन्ती, अल्प चिन्ती
और मित-चिन्ती। वे जगल (की नदी) से वस्ती के पास आ गए। मितचिन्ती
ने बाकी दोनो को कहा—"यह वस्ती है। यहाँ सशकित रहने की तथा भय-
भीत रहने की जरूरत है। मछुवे लोग नाना प्रकार के मछली पकड़ने के जाल
आदि फेंककर मछलियां पकड़ते है। हम जगल को ही चले।"
बाकी दोनो जनो ने आलस्य के कारण और लोभ के कारण 'आज चले,
कल चलें' कहते हुए तीन महीने गुजार दिए। मछुओ ने नदी में जाल फेंका।
बहुचिन्ती और अल्प चिन्ती खाने की चीज को ग्रहण करते हुए आगे आगे
जाते थे। वे अपनी मूर्खता के कारण जाल की गन्ध का ख्याल न कर जाल
में ही जा फँसे। मितचिन्ती ने पीछे आते हुए जाल की गन्ध सूंघकर समझ
लिया कि वे दोनो जाल में जा फँसे। उसने सोचा—इन दोनो आलसी तथा
मूर्खों को जीवन-दान दूँ। यह सोच यह बाहर की तरफ से जाल मे घुस जाल
फाड कर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए जाल के आगे गिरा;
फिर पिछली तरफ से फाडकर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए
पिछली तरफ गिरा। मछुओ ने यह समझकर कि मच्छ जाल फाडकर निकल
गए जाल के सिरो को खोल फेंक दिया। वे दोनो मच्छ जाल से छूटकर
पानी में जा पडे। इस प्रकार मितचिन्ती ने उनके प्राण बचाए।
शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह बुद्ध होने पर यह गाथा कही—