जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextसीहचम्म ] २७१
यदि फिर ऊँचे बोलेगा, तो तेरा शृगाल होना जान लेंगे।" इस प्रकार उपदेश
देते हुए दूसरी गाथा कही—
मा रवं नदि राजपुत्त ! अप्पसद्दो वने वस,
सरेन खो तं जानेय्युं न हि ते पेत्तिको सरो ॥
[ राजपुत्र ! तू ऊँचे स्वर मे मत बोल । धीरे बोलता हुआ बन मे रह । तेरे
स्वर से जान लेंगे, (कि तू गीदड है) क्योकि तेरा स्वर पिता का स्वर नहीं । ]
राजपुत्त, मृगराज सिंह का पुत्र । इस उपदेश को सुनकर उसने फिर जोर
से बोलने की हिम्मत नहीं की।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
शृगाल कोकालिक था। स्वजातीय पुत्र राहुल । मृगराज तो मै ही था।
१८६ सीहचम्म जातक
“नेत सीहस्स नदित .” यह भी शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय कोकालिक (भिक्षु) के ही बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह (भिक्षु) उस समय स्वर से सूत्र पाठ करना चाहता था। शास्ता ने
वह समाचार सुन पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
कृषक कुल में पैदा हो बडे होने पर खेती करके जीविका चलाते थे।