Skip to content
SarvaKosh
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 285 of 479

Read in context
Page 285

२७० [ २४१८८
पूर्वक कहनो चाहिए। उस समाचार को जान शास्ता ने कहा-'भिक्षुओ,
न केवल अभी कोकालिय अपनी वाणी के कारण प्रकट हो गया, वह पहले भी
जाहिर हो गया था।" इतना कह शास्ता ने अतीत की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हिमालय प्रदेश में पैदा हुए। वहाँ उन्हें एक शृगाली के साथ सहवास करने
के फलस्वरूप एक पुत्र हुआ। उसकी अंगुलियाँ, उसके नख, उसके केसर,
उसका रग, उसका आकार प्रकार पिता की तरह का था। स्वर माता की
तरह का।
एक दिन वर्षा हो चुकने पर सिंहो के दहाड दहाड कर सिंह क्रीडा करते
समय, उसने भी उनके बीच म दहाडने की इच्छा से शृगाल की तरह आवाज
की। उसकी बोली सुनकर सब सिंह चुप हो गए। सिंह का अपना एक स्वजातीय
पुत्र था। उसने उसकी आवाज सुनकर पूछा-'तात ! यह सिंह वर्ण आदि
से तो हमारे ही जैसा है, लेकिन इसका स्वर दूसरी तरह का है। यह कौन
है ?" ऐसा प्रश्न करते हुए उसने यह गाथा कही—
सीहङ्गुली सीहनखो सीहपादपतिद्वितो
सो सीहो सीहसङ्घम्हि एको नदति अञ्ञथा ॥
[सिंह की सी अँगुलियाँ, सिंह के से नाखून और सिंह के से पैरा वाला
वह सिंह सिंहो की जमात में दूसरी तरह की आवाज करता है।]
सीहपादपतिट्ठितो, सिंह के पैरो ही पर प्रतिष्ठित । एको नदति अञ्ञथा,
अकेला दूसरे सिंहो से भिन्न शृगाल-स्वर से बोलता हुआ अन्यथा बोलता है।
इसे सुन बोधिसत्व ने कहा-'तात ! यह तेरा भाई शृगाली का लडका
है। इसका रूप मेर जैसा है, आवाज माता जैसी।" फिर शृगाल-पुत्र को
, बुलाकर कहा-'तात ! अब से तू जब तक यहाँ रहे अधिक मत बोलना।