जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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उस समय एक बनिया गधे पर बोझा लाद कर व्यापार करता हुआ घूमता
था। वह जहाँ जहाँ जाता वहाँ वहाँ गधे की पीठ पर से सामान उतार, गधे
को सिंह की खाल पहना, धान तथा जौ के खेत में छोड़ देता। खेत की
रखवाली करने वाले उसे देख, शेर समझ, पास न जा सकते थे।
एक दिन उस बनिए ने एक ग्राम-द्वार पर ठहर प्रात काल का भोजन
पकाते समय गधे को सिंह की खाल पहना जौ के खेत में छोड़ दिया। खेत की
रखवाली करने वालो ने उसे शेर समझ पास न जा सकने के कारण घर जाकर
खबर दी। सारे ग्रामवासी आयुध ले, शङ्ख फूंकते तथा ढोल बजाते हुए खेत
के समीप पहुँच चिल्लाने लगे। गधे ने मृत्युभय से डर गधे की तरह आवाज
की। वह गधा है जान बोधिसत्व ने पहली गाथा कही—
नेतं सीहस्स नदित न व्याग्घस्स न दीपिनो,
पारुतो सीहचम्मेन जम्मो नदति गद्दभो ॥
[ न यह शेर की आवाज है, न व्याघ्र की, न चीते की, शेर की खाल पहन
कर दुष्ट गधा चिल्लाता है।]
जम्मो, नीच।
ग्रामवासयो ने भी यह जान कि यह गधा है, उसकी हड्डियाँ तोड़ते हुए
उसे पीटा और सिंह की खाल लेकर चले गए। उस बनिए ने आकर जब विपत्ति
में पड़े उस गधे को देखा तो दूसरी गाथा कही—
चिरम्पि खो तं खादेय्य गद्दभो हरितं यवं,
पारुतो सीहचम्मेन रवमानोव दूसयि ॥
[सिंह की खाल पहन कर तू चिरकाल तक हरे जौ खाता। हे गधे तूने
बोल कर ही अपने को नष्ट किया।]
तं निपात मात्र है। यह गद्दभो अपने गधेपन को छिपा सीहचम्मेन पारुतो
चिरम्पि देर तक हरितं यवं खादेय्य अर्थ है। रवमानोव दूसयि अपने गधे की