जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
by श्री गुरु नानक देव जी
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पुरुष के हाथ में ताकत है वही रचना करके देख रहा है। गुरु नानक
जी कहते हैं कि फिर तो यही जानना चाहिए कि इस संसार में न
कोई स्वेच्छा से नीच है, न उत्तम है, वह प्रभु जिस को कर्मानुसार
जैसा रखता है वैसा ही वह रहता है॥ ३३॥
राती रुती थिती वार ॥
पवण पाणी अगनी पाताल ॥
तिस विच धरती थाप रखी धरम साल ॥
तिस विच जीअ जुगत के रंग ॥
तिन के नाम अनेक अनंत ॥
करमी करमी होए वीचार ॥
सचा आप सचा दरबार ॥
तिथै सोहन पंच परवाण ॥
नदरी करम पवै नीसाण ॥
कच पकाई ओथै पाए ॥
नानक गया जापै जाए ॥३४॥
रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों, वायु, जल, अग्नि व
पाताल आदि यावत प्रपंच हैं। स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी
धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं।
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