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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

by श्री गुरु नानक देव जी

DevanagariHindipublished56 pages

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
पुरुष के हाथ में ताकत है वही रचना करके देख रहा है। गुरु नानक
जी कहते हैं कि फिर तो यही जानना चाहिए कि इस संसार में न
कोई स्वेच्छा से नीच है, न उत्तम है, वह प्रभु जिस को कर्मानुसार
जैसा रखता है वैसा ही वह रहता है॥ ३३॥
राती रुती थिती वार ॥
पवण पाणी अगनी पाताल ॥
तिस विच धरती थाप रखी धरम साल ॥
तिस विच जीअ जुगत के रंग ॥
तिन के नाम अनेक अनंत ॥
करमी करमी होए वीचार ॥
सचा आप सचा दरबार ॥
तिथै सोहन पंच परवाण ॥
नदरी करम पवै नीसाण ॥
कच पकाई ओथै पाए ॥
नानक गया जापै जाए ॥३४॥
रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों, वायु, जल, अग्नि व
पाताल आदि यावत प्रपंच हैं। स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी
धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं।
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