जैमिनीय ब्राह्मण (सामवेद का प्राचीनतम गूढ़ ब्राह्मण ग्रन्थ - सरस्वती विहार संस्करण)

जैमिनीय ब्राह्मण (सामवेद का प्राचीनतम गूढ़ ब्राह्मण ग्रन्थ - सरस्वती विहार संस्करण)
Jaiminiya Brahmana of the Samaveda with Commentary
महर्षि जैमिनि (सम्पादक: प्रो. रघुवीर एवं लोकेश चन्द्र) द्वारा
DevanagariSanskritpublished106 पृष्ठ
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इति च गतिं चानूचिमहे६ त्वम् अस्मभ्यम्Notice superscript 5 onअग्निहोत्र: अग्निहोत्र५. Footnote 5: ५ य-वर्जं सर्वत्र अग्निहोत्रं. Notice superscript 6 on चानूचिमहे: चानूचिमहे६. Footnote 6: ६ ? ल ॰नूचामहे व ॰नूचेमहे श ॰नूचेमहे ध ॰नूचिमहे`.
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अग्निहोत्र इति च गतिं च ब्रूहि वयं तुभ्यं पृथक् पञ्च वरान् दद्म
Line 55:
शताश्रानि ददानीति ॥
Wait, शताश्रानि or शतान्यानि?
Look at line 55:
श ता श्रा नि -> शताश्रानि!
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अग्नीन् आद्धानः प्रातर् एवोद्धरेत्१ । द्विस्र् सायं द्विः प्रातर्
Wait, द्विस्र् with a virama under स and repha? Look at:
द्विस्र् सायं -> द्वि स with virama and repha on top: द्विस्र्!
Line 63: