हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४-
निमज्जनस्थानम् । वयं च निमज्जनस्थानाभावान्मृतार्हा इव ।
किं कुर्मः ? क्व यामः ?' । ततो हस्तिराजो नातिदूरं गत्वा निर्मलं
ह्रदं दर्शितवान् । ततो दिनेषु गच्छत्सु तत्तीरावस्थिता
गजपादाहतिभिश्चूर्णिताः क्षुद्रशशकाः ।' अनन्तरं शिलीमुखो
नाम शशकश्चिन्तयामास—'अनेन गजयूथेन पिपासाकुलितेन
प्रत्यहमत्रागन्तव्यम् । अतो विनश्यत्यस्मत्कुलम् ।' ततो विजयो
नाम वृद्धशशकोऽवदत्—'मा विषीदत । मयात्र प्रतीकारः
कर्तव्यः ।' ततोऽसौ प्रतिज्ञाय चलितः । गच्छता च तेनालोचि-
तम्—'कथं गजयूथसमीपे स्थित्वा वक्तव्यम् ?
किसी समय वर्षाके मोसममें वर्षा न होनेसे प्यासके मारे हाथियोंका झुंड
अपने स्वामीसे कहने लगा—'हे स्वामी ! हमारे जीनेके लिये अब कौनसा उपाय
है ? छोटे छोटे जन्तुओंको नहानेके लिये भी स्थान नहीं है । और हम तो स्नानके
लिये स्थान न होनेसे मरेके समान हैं । क्या करें ? कहाँ जायँ ?' हाथियोंके
राजाने समीपही जो एक निर्मल सरोवर था वहां जा कर दिखा दिया । फिर कुछ
दिन बाद उस सरोवरके तीर पर रहने वाले छोटे छोटे शशक हाथियोंके पैरोंकी
रेलपेलसे खुँद गये । पीछे शिलीमुख नाम शशक सोचने लगा—'प्यासके मारे
यह हाथियोंका झुंड, यहाँ नित्य आवेगा, इसलिये हमारा कुल तो नष्ट हो
जायगा'. फिर विजय नाम एक बूढ़े शशकने कहा—'खेद मत करो। मैं इसका
उपाय करूँगा । फिर वह प्रतिज्ञा करके चला गया । और चलते चलते इसने
सोचा—'कैसे हाथियोंके झुंडके पास खड़े हो कर बात चीत करनी चाहिये ?
यतः,—
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः ।
पालयन्नपि भूपालः प्रहसन्नपि दुर्जनः ॥ १४ ॥
क्योंकि—हाथी ( स्पर्शसेभी ) छूताही, साँप सूंघताही, राजा रक्षा करता
हुआभी, और दुर्जन हँसता हुआभी मार डालता है ॥ १४ ॥
अतोऽहं पर्वतशिखरमारुह्य यूथनाथं संवादयामि ।' तथाऽनुष्ठिते
यूथनाथ उवाच—'कस्त्वम् ?, कुतः समायातः ?' । स ब्रूते—
'शशकोऽहम् । भगवता चन्द्रेण भवदन्तिकं प्रेषितः ।' यूथपति-
राह—'कार्यमुच्यताम् ।'