हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१३ ] महदाश्रयकी प्रशंसा १६१
शृणु,—
सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः ।
यदि दैवात्फलं नास्ति च्छाया केन निवार्यते ? ॥ १० ॥
सुन,—फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे
फल ( प्राप्य ) नहीं है तो छायाको कौन भला दूर कर सकता है ? ॥ १० ॥
अन्यच्च,—
हीनसेवा न कर्तव्या कर्तव्यो महदाश्रयः ।
पयोऽपि शौण्डिकीहस्ते वारुणीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
और दूसरे—नीचकी सेवा नहीं करनी चाहिये, बडे पुरुषोंका आश्रय करना
चाहिये, जैसे कलारिनके हाथमें दूधकोभी लोग वारुणी ( शराब ) समझते हैं ११
अन्यच्च,—
महानप्यल्पतां याति निर्गुणे गुणविस्तरः ।
आधाराधेयभावेन गजेन्द्र इव दर्पणे ॥ १२ ॥
और गुणहीनमें बड़ा गुणका कहना भी लघुताको प्राप्त होता है, जैसे आधार
और आधेयभावसे दर्पणमें हाथीका प्रतिबिंब छोटा दीखता है ॥ १२ ॥
विशेषतश्च,—
व्यपदेशेऽपि सिद्धिः स्यादतिशक्ते नराधिपे ।
शशिनो व्यपदेशेन शशकाः सुखमासते' ॥ १३ ॥
और विशेष करके राजाके सबल होने पर उसके छल(बहाने)सेभी कार्य सिद्ध
हो जाता है । जैसे चन्द्रमाके छल(बहाने)से खरगोश सुखसे रहने लगे' ॥ १३ ॥
मयोक्तम्—'कथमेतत् ?' । पक्षिणः कथयन्ति—
मैंने कहा-'यह कथा कैसी है ?' पक्षी कहने लगे ।—
कथा ४
[ हाथियोंका झुंड और बूढे शशककी कहानी ४ ]
'कदाचिदपि वर्षासु वृष्टेरभावात्तृषार्तो गजयूथो यूथपति-
माह—'नाथ ! कोऽभ्युपायोऽस्माकं जीवनाय ? नास्ति क्षुद्रजन्तूनां
१ जिसमें वस्तु रक्खी जाय. २ वस्तु.
हि० ११