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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

सप्तमोऽध्यायः

विष्णुपर्व ]
सप्तमोऽध्यायः
२२१

पूतना नाम शकुनी घोरा प्राणिभयंकारी ।
भाजगामार्ड्ढरात्रे वै पक्षौ क्रोधाद् विधुन्वती ॥ २३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुछ कालके बाद ब्रजमें आधी रातके समय क्रोधपूर्वक अपने दोनों पंख हिलाती हुई पक्षिणीका वेष धारण किये एक राक्षसी आयी। वह भोजराज कंसकी धाय थी, उसका नाम पूतना था। पूतना नामवाली वह घोर पक्षिणी समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर थी ॥ २२-२३ ॥

ततोऽर्धरात्रसमये पूतना प्रत्यदृश्यत ।
व्याघ्रगम्भीरनिर्घोषं व्याहरन्ती पुनः पुनः ॥ २४ ॥

आधी रातके समय जब पूतना दिखायी दी, उस समय वह व्याघ्रके दहाड़नेके-से गम्भीर घोषमें बारंबार गर्जना कर रही थी ॥ २४ ॥

निलिल्ये शकटस्याक्षे प्रस्रवोत्पीडवर्षिणी ।
ददौ स्तनं च कृष्णाय तस्मिन् सुप्ते जने निशि ॥ २५ ॥

वह मानवी स्त्रीका वेष धारण करके छकड़ेके धुरेके नीचे छिप गयी। उस समय उसके स्तनोंमें इतना दूध बढ़ आया था कि उनमें पीड़ा होने लगी थी, इसीलिये वह दूधकी वर्षा सी करने लगी। उस निशीथ-कालमें जब सब लोग सो गये थे, उसने कृष्णके मुखमें अपना स्तन दे दिया ॥ २५ ॥

तस्याः स्तनं पपौ कृष्णः प्राणैः सह विनद्य च ।
छिन्नस्तनी तु सहसा पपात शकुनी भुवि ॥ २६ ॥

लाल कन्हैया उस स्तनको उसके प्राणोंके साथ ही पी गया, उसका स्तन कट गया और वह पक्षिणी घोर चीत्कार करके सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥

तेन शब्देन वित्रस्तास्ततो बुबुधिरे भयात् ।
स नन्दगोपो गोपा वै यशोदा च सुविक्लवा ॥ २७ ॥

उसके उस शब्दसे संत्रस्त होकर नन्दगोप, दूसरे-दूसरे गोप तथा अत्यन्त व्याकुल हुई यशोदा—ये सब के-सब भयके मारे जाग उठे ॥ २७ ॥

ते तामपश्यन् पतितां विसंज्ञां विपयोधराम् ।
पूतनां पतितां भूमौ वज्रेणेव विदारिताम् ॥ २८ ॥

उन्होंने देखा, पूतना पृथ्वीपर अचेत होकर पड़ी है। उसका स्तन कट गया है और वह ऐसी प्रतीत होती है, मानो वज्रसे विदीर्ण कर दी गयी हो ॥ २८ ॥

इदं किं त्विति संत्रस्ताः कस्येदं कर्म चेत्यपि ।
नन्दगोपं पुरस्कृत्य गोपास्ते पर्यवारयन् ॥ २९ ॥

यह क्या है ? किसका यह कर्म है ? ऐसी बातें करते हुए वे गोप भयभीत हो गये और नन्दजीको आगे करके पूतनाको घेरकर खड़े हो गये ॥ २९ ॥

नाध्यगच्छन्त च तदा हेतुं तत्र कदाचन ।
आश्चर्यमाश्चर्यमिति ब्रुवन्तोऽनुययुर्गृहान् ॥ ३० ॥

वे उस समय उस घटनाके कारणका पता कदापि न लगा सके और आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! ऐसा कहते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ३० ॥

गतेषु तेषु गोपेषु विस्मितेषु यथागृहम् ।
यशोदां नन्दगोपस्तु पप्रच्छ गतसम्भ्रमः ॥ ३१ ॥

उन विस्मित हुए गोपोंके अपने-अपने घर चले जानेपर सम्भ्रमरहित हुए नन्दगोपने यशोदासे पूछा—॥ ३१ ॥

कोऽयं विधिर्न जानामि विस्मयो मे महानयम् ।
पुत्रस्य मे भयं तीव्रं भीरुत्वं समुपागतम् ॥ ३२ ॥

'विधाताका यह कैसा विधान है, यह मेरी समझमें नहीं आता। इस घटनासे मुझे महान् विस्मय हो रहा है। यहाँ मेरे पुत्रके लिये तीव्र भय उपस्थित हुआ है, जिससे हमलोगोंमें भीरुता आ गयी है' ॥ ३२ ॥

यशोदा त्वब्रवीद् भीता नार्य जानामि किंत्विदम् ।
दारकेण सहानेन सुप्ता शब्देन बोधिता ॥ ३३ ॥

यह सुनकर यशोदाने भयभीत होकर कहा—'आर्य ! मैं भी नहीं जानती कि यह क्या है ? मैं तो इस बच्चेके साथ सोयी थी। इस राक्षसीके चीत्कारसे ही जग गयी हूँ' ॥

यशोदायामजानन्त्यां नन्दगोपः सबान्धवः ।
कंसाद् भयं चकारोग्रं विस्मयं च जगाम ह ॥ ३४ ॥

जब यशोदाने भी अपनी अनभिज्ञता प्रकट की, तब बन्धु-बान्धवोंसहित नन्दगोप कंससे अत्यन्त भय मानने लगे और मन-ही-मन विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां शकटभङ्गपूतनावधे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णकी बाललीलाके प्रसङ्गमें शकट-भङ्ग और पूतनाका वधविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


सप्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और बलरामका ब्रजमें घुटनोंके बल चलना तथा श्रीकृष्णका उलूखलमें बँधकर यमलार्जुन-भङ्गकी लीला करना

वैशम्पायन उवाच
कृष्णसंकर्षणौ चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् ॥ १ ॥
काले गच्छति तौ सौम्यौ शास्तौ रूढतनामको ।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! कुछ काल

२५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


बीतनेपर वे दोनों सौम्य बालक, जिनके नामकरण-संस्कार हो चुके थे और जो कृष्ण और संकर्षण नामसे प्रसिद्ध थे, घुटनों-के बल चलने-फिरने लगे ॥ १ ॥

तावन््योन्यगतौ बालौ बाल्यादेवैकतां गतौ।
एकमूर्तिधरौ कान्तौ बालचन्द्रार्कवर्चसौ ॥ २ ॥

बचपनसे ही वे दोनों बच्चे एक दूसरेमें अन्तर्भूत-से होकर एकताको प्राप्त हो गये थे। ऐसा जान पड़ता था कि ये दोनों एक ही शरीर धारण करते हैं। वे दोनों भाई बालचन्द्र और बालसूर्यके समान कान्तिमान् थे ॥ २ ॥

एकनिर्माणनिर्मुक्तावेकशय्यासनाशनौ ।
एकवेषधरावेकं पुष्यमाणौ शिशुव्रतम् ॥ ३ ॥

वे दोनों मानो एक ही साँचेके ढले थे (अथवा अभिन्न और जन्मरहित थे)। एक-सी शय्या, आसन और भोजन-का उपभोग करते थे। एक समान वेष धारण करते थे और एक ही शिशुव्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ३ ॥

एककार्यान्तरगतावेकदेहौ द्विधाकृतौ ।
एकचर्यौ महावीर्यावेकस्य शिशुतां गतौ ॥ ४ ॥

वे एक ही कार्यमें संलग्न थे और एक ही शरीरके दो भागसे प्रतीत होते थे। उनकी दिनचर्या एक-सी थी। वे महा-पराक्रमी बालक एक ही पिताके शिशु थे ॥ ४ ॥

एकप्रमाणौ लोकानां देववृत्तान्तमानुषौ ।
कृत्स्नस्य जगतो गोपौ संवृत्तौ गोपदारकौ ॥ ५ ॥

लोगोंकी दृष्टिमें वे एक-जैसे कदके थे। उन्होंने देवताओं-के 'दुष्टदमन और धर्मस्थापन' रूप सिद्धान्तके पालनके लिये मानव-शरीर ग्रहण किया था। वे सम्पूर्ण जगत्‌के संरक्षक हो-कर भी गोपबालक बन गये थे ॥ ५ ॥

अन्योन्यव्यतिषक्ताभिः क्रीडाभिरभिशोभितौ ।
अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥ ६ ॥

वे दोनों भाई एक दूसरेसे मिली हुई क्रीड़ाओंद्वारा सुशोभित होते थे, जैसे आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य एक दूसरेकी किरणोंसे बँधकर एक साथ हो गये हों ॥ ६ ॥

विसर्पन्तौ तु सर्वत्र सर्पभोगभुजावुभौ ।
रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ दृप्तौ कलभकाविव ॥ ७ ॥

उन दोनोंकी भुजाएँ सर्पोंके शरीरके समान जान पड़ती थीं। वे उनके द्वारा सब ओर चलते-फिरते और सरकते थे। उस समय धूलसे भरे हुए शरीरवाले वे दोनों भाई दर्पभरे दो हस्ति-शावकोंके समान शोभा पाते थे ॥ ७ ॥

क्वचिद् भस्मप्रदीप्ताङ्गौ करीषप्रोक्षितौ क्वचित् ।
तौ तत्र पर्यधावेतां कुमाराविव पावकौ ॥ ८ ॥

कहीं तो उनके दीप्तिमान् अङ्गोंमें राख लिपट जाती और कहीं वे करसी (कंडोंके चूर्ण)से नहा उठते थे। वे वहाँ अग्नि-के दो कुमार शाख और विशाखके समान सुशोभित होते हुए सब ओर दौड़ लगाते थे ॥ ८ ॥

क्वचिज्जानुभिरुद्घृष्टैः सर्पमाणौ विरेजतुः ।
क्रीडन्तौ वत्सशालासु शकृद्दिग्धाङ्गमूर्धजौ ॥ ९ ॥

कभी घिसे हुए घुटनोंके बल सरकते हुए श्रीकृष्ण-बलराम बड़ी शोभा पाते थे। कभी वे बछड़ोंके स्थानोंमें जाकर खेलने लगते और सारे अङ्गों तथा सिरके बालोंमें गो-बर लपेट लेते थे ॥ ९ ॥

शुशुभाते श्रिया जुष्टावानन्दजननौ पितुः ।
जनं च विप्रकुर्वाणौ विहसन्तौ क्वचित् क्वचित् ॥ १० ॥

कान्तिरूपिणी श्रीसे सेवित होकर वे दोनों भाई अनुपम शोभा पाते और पिताको आनन्द प्रदान करते थे। कभी-कभी बालस्वभाववश किसी-किसीके विपरीत कार्य कर बैठते और जोर-जोरसे हँसने लगते थे ॥ १० ॥

तौ तत्र कौतूहलिनौ मूर्धजन्याकुलेक्षणौ ।
रेजतुश्चन्द्रवदनौ दारकौ सुकुमारकौ ॥ ११ ॥

वे सदा क्रीड़ा-कौतूहलमें ही लगे रहते थे। उनके सिरके घुँघराले बाल नेत्रोंपर लटककर उन्हें व्याकुल एवं चञ्चल कर देते थे। उन दोनोंके मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर थे; अतः वे सुकुमार बालक बड़े सुहावने लगते थे ॥ ११ ॥

अतिप्रसक्तौ तौ दृष्ट्वा सर्वव्रजविचारिणौ ।
नाशकत् तौ वारयितुं नन्दगोपः सुदुर्मदौ ॥ १२ ॥

वे क्रीडामें ही आसक्त हो सारे व्रजमें विचरते रहते थे। उन दोनों अत्यन्त मतवाले बालकोंको सर्वत्र जाते देखकर भी नन्दगोप रोक नहीं पाते थे ॥ १२ ॥

ततो यशोदा संक्रुद्धा कृष्णं कमलोचनम् ।
आनाय्य शकटीमूले भर्त्सयन्ती पुनः पुनः ॥ १३ ॥
दाम्ना चैवोदरे बद्ध्वा प्रत्यबन्धदुलूखले ।
यदि शक्नोषि गच्छेति तमुक्त्वा कर्म साकरोत् ॥ १४ ॥

तत्र एक दिन यशोदा मैया अत्यन्त कुपित हो कमल-नयन श्रीकृष्णको एक गाड़ीके पास ले जाकर वारंवार डांटने-फटकारने लगी। इतना ही नहीं, उसने उनके पेट और कमर-में रस्सी बाँधकर उस रस्सीको ओखलीमें कस दिया और कहा—'अब जा सको तो जाओ।' इतना कहकर वह घरके काम-धंधोंमें लग गयी ॥ १३-१४ ॥

व्यग्रायां तु यशोदायां निर्जगाम ततोऽङ्कणात् ।
शिशुलीलां ततः कुर्वन् कृष्णो विस्मापयन् व्रजम् ।
सोऽङ्कणात्रिःसृतः कृष्णः कर्षमाण उलूखलम् ॥ १५ ॥
यमलाभ्यां प्रवृद्धाभ्यामर्जुनाभ्यां चरन् वने ।
मध्यान्निष्चक्राम तयोः कर्षमाण उलूखलम् ॥ १६ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तमोऽध्यायः [ २३३


यशोदाके कार्यमें तत्पर होते ही लाला कन्हैया बाल-लीला करता और ब्रजके लोगोंको विस्मयमें डालता हुआ आँगनसे निकला। वह ओखलीको घसीटता हुआ वनकी ओर चला। मार्गमें एक साथ उत्पन्न हुए दो अर्जुनके वृक्ष थे, जो बहुत बड़े हो गये थे। कन्हैया अपनी ओखलीको खींचता हुआ उन्हीं दोनों वृक्षोंके बीचसे होकर निकला ॥ १५-१६ ॥

तत् तस्य कर्षतो बद्धं तिर्यग्गतमुलूखलम्।
लग्नं ताभ्यां समूलाभ्यामर्जुनाभ्यां चकर्ष च ॥ १७॥
खींचते हुए कन्हैयाके उदरसे बँधी हुई वह ओखली टेढ़ी होकर उन दोनों अर्जुन-वृक्षोंकी जड़में जा लगी और वहीं अटक गयी। फिर तो उसने उन वृक्षोंसहित ओखलीको जोर-से खींचा ॥ १७ ॥

तावर्जुनौ कृष्यमाणौ तेन बालेन रंहसा ।
समूलविटपौ भग्नौ स तु मध्ये जहास वै ॥ १८ ॥
निदर्शनार्थं गोपानां दिव्यं स्वबलमास्थितः ।
बालक कन्हैयाद्वारा वेगसे खींचे गये वे दोनों अर्जुनवृक्ष जड़ और शाखाओंसहित टूटकर गिर पड़े और वह अपने दिव्य बलका आश्रय ले गोपोंको दिखानेके लिये उन दोनों वृक्षोंके बीचमें खड़ा-खड़ा हँसने लगा ॥ १८३ ॥

तद्दाम तस्य बालस्य प्रभावादभवद् दृढम् ॥ १९ ॥
यमुनातीरमार्गस्था गोप्यस्तं ददृशुः शिशुम् ।
क्रन्दन्त्यो विस्मयन्त्यश्च यशोदां ययुरङ्गनाः ॥ २० ॥
उस बालकके प्रभावसे वह रस्सी और भी दृढ़ हो गयी। यमुनातीरके मार्गपर खड़ी हुई गोपियोंने जब बालकृष्णको उस अवस्थामें देखा, तब वे आश्चर्यचकित हो करुणक्रन्दन करती हुई यशोदाजीके पास गयीं ॥ १९-२० ॥

तास्तु सम्भ्रान्तवदना यशोदामूचुरङ्गनाः ।
एह्यागच्छ यशोदे त्वं सम्भ्रमात् किं विलम्बसे ॥ २१॥
यौ तावर्जुनवृक्षौ तु व्रजे सत्योपयाचनौ ।
पुत्रस्योपरि तावेतौ पतितौ ते महीरुहौ ॥ २२ ॥
उन सबके मुखपर घबराहट छायी हुई थी। उन गोपाङ्गनाओंने यशोदासे कहा—'यशोदाजी ! वेगसे आओ ! आओ !! सम्भ्रमके कारण तुम विलम्ब क्यों करती हो। ब्रजमें वे जो दोनों अर्जुनवृक्ष थे, जहाँ हमारी प्रत्येक याचना और मनौती सफल होती थी, वे दोनों वृक्ष तुम्हारे पुत्रके ऊपर गिर पड़े ॥ २१-२२ ॥

दृढेन दाम्ना तत्रैव बद्धो वत्स इवोदरे ।
जहास वृक्षयोर्मध्ये तव पुत्रः स बालकः ॥ २३ ॥
'जैसे बँधा हुआ बछड़ा हो, उसी प्रकार उदरमें मजबूत रस्सीसे बँधा हुआ तुम्हारा वह बालक उन वृक्षोंके बीचमें खड़ा-खड़ा हँस रहा था ॥ २३ ॥

उत्तिष्ठ गच्छ दुर्मेधे मूढे पण्डितमानिनि ।
पुत्रमानय जीवन्तं मुक्तं मृत्युमुखादिव ॥ २४ ॥
'अपनेको पण्डित माननेवाली मूढ़ दुर्बुद्धि यशोदे ! उठो। चलो हमारे साथ और अपने जीवित पुत्रको, जो मानो मौतके मुखसे बचकर निकला है, घर ले आओ' ॥ २४ ॥

सा भीता सहसोत्थाय हाहाकारं प्रकुर्वती ।
तं देशमगमद् यत्र पतितौ तावुभौ द्रुमौ ॥ २५ ॥
यशोदा भयभीत हो सहसा उठी और हाहाकार करती हुई उस स्थानपर गयी, जहाँ उसके लालाने उन दोनों वृक्षोंको धराशायी कर दिया था ॥ २५ ॥

सा ददर्श तयोर्मध्ये द्रुमयोरात्मजं शिशुम् ।
दाम्ना निबद्धमुदरे कर्षमाणमुलूखलम् ॥ २६ ॥
उसने अपने पुत्रको उन दोनों वृक्षोंके बीचमें खड़ा देखा, जो रस्सीसे पेटमें बँधी हुई ओखलीको अपनी ओर खींच रहा था ॥ २६ ॥

सगोपीगोपवृद्धश्च समुवाच व्रजस्तदा ।
पर्यागच्छन्त ते द्रष्टुं गोषेषु महदद्भुतम् ॥ २७ ॥
गोपियों और बड़े-बूढ़े गोपोंसहित सारे ब्रजमें उस समय इसी घटनाकी चर्चा होने लगी। गोपोंके यहाँ जो यह महान् और अद्भुत घटना घटित हुई थी, इसे देखनेके लिये चारों ओरसे लोग आने लगे ॥ २७ ॥

जजल्पुस्ते यथाकामं गोपा वनविचारिणः ।
केनेमौ पातितौ वृक्षौ घोषस्यायतनोपमौ ॥ २८ ॥
वनमें विचरनेवाले वे गोप अपनी इच्छाके अनुसार वहाँ आकर कहने लगे—'अहो ! ब्रजके ये दोनों वृक्ष देवमन्दिरके समान थे, इनको किसने गिरा दिया ॥ २८ ॥

विना वातं विना वर्षं विद्युत्प्रपतनं विना ।
विना हस्तिकृतं दोषं केनेमौ पातितौ द्रुमौ ॥ २९ ॥
'न आँधी चली, न वर्षा हुई, न बिजली गिरी और न किसी हाथीने ही आकर टक्कर मारी, इन सब दोषोंके बिना ही ये दोनों वृक्ष किसके द्वारा गिराये गये ॥ २९ ॥

अहो बत न शोभेतां विमूलवार्जुनद्विमौ ।
भूमौ निपतितौ वृक्षौ वितोयौ जलदाविव ॥ ३० ॥
'अहो ! जड़से अलग हो जानेके कारण पृथ्वीपर गिरे हुए ये दोनों अर्जुन वृक्ष जलहीन बादलोंके समान शोभारहित हो गये हैं ॥ ३० ॥

यदीमौ घोषरचितौ घोषकल्याणकारिणौ ।
नन्दगोप प्रसङ्गो ते द्रुमावेवं गतावपि ।
यच्च ते दारको मुक्तो विपुलाभ्यामपि क्षितौ ॥ ३१ ॥
'नन्दगोप ! यदि ये दोनों वृक्ष इस गोष्ठमें लगाये गये थे और समस्त घोषवासियोंका कल्याण करते थे तो आज

२३४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

इस अवस्था में पहुँचकर भी ये दोनों आपपर प्रसन्न ही हैं, जिससे विशाल होनेपर भी इन वृक्षोंने पृथ्वीपर गिरते समय तुम्हारे बालकको जीवित छोड़ दिया है ॥ ३१ ॥

औत्पातिकमिदं घोषे तृतीयं वर्तते त्विह ।
पूतनाया विनाशश्च द्रुमयोः शकटस्य च ॥ ३२ ॥

'इस व्रजमें यह तीसरी बार औत्पातिक घटना हुई है। पूतनाका विनाश, छकड़ेका उलटना और वृक्षोंका धराशायी होना—ये तीन उपद्रव यहाँ हो चुके ॥ ३२ ॥

अस्मिन् स्थाने च वासोऽयं घोषस्यास्य न युज्यते ।
उत्पाता ह्यत्र दृश्यन्ते कथयन्तो न शोभनम् ॥ ३३ ॥

'इस स्थानपर हमारे इस व्रजका रहना अब उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि यहाँ अशुभ परिणामकी सूचना देनेवाले उत्पात दिखायी देने लगे हैं' ॥ ३३ ॥

नन्दगोपस्तु सहसा मुक्त्वा कृष्णमुलूखलात् ।
निवेश्य चाङ्के सुचिरं मृतं पुनरिवागतम् ॥ ३४ ॥
नातृप्यत् प्रेक्षमाणो वै कृष्णं कमलोचनम् ।

इतनेहीमें नन्दगोपने सहसा बन्धन खोलकर श्रीकृष्णको ओखलीसे मुक्त कर दिया और मानो वह बालक मरकर पुनः जी उठा हो, ऐसा मानते हुए वे देरतक उसे अपनी गोदमें चिपकाये रहे । उस समय वे कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर देखते-देखते तृप्त नहीं होते थे ॥ ३४ १/२ ॥

ततो यशोदां गर्हन् वै नन्दगोपो विवेश ह ॥ ३५ ॥
स च गोपजनः सर्वो व्रजमेव जगाम ह ।

तदनन्तर नन्दगोप यशोदाकी निन्दा करते हुए घरमें गये, साथ ही अन्य सब गोप भी व्रजमें ही पधारे ॥ ३५ १/२ ॥

स च तेनैव नाम्ना तु कृष्णो वैदामबन्धनात् ।
गोष्ठे दामोदर इति गोपीभिः परिगीयते ॥ ३६ ॥

उस दाम अर्थात् रस्सीसे उदरमें बाँधे जानेके कारण श्रीकृष्णका नाम दामोदर हो गया । व्रजमें गोपियाँ उसी नामसे उनकी लीलाओंका गान करने लगीं ॥ ३६ ॥

एतदाश्चर्यभूतं हि बालस्यासीद् विचेष्टितम् ।
कृष्णस्य भरतश्रेष्ठ घोषे निवसतस्तदा ॥ ३७ ॥

भरतश्रेष्ठ ! व्रजमें निवास करते समय बालक कृष्णकी ऐसी ही आश्चर्यमयी लीलाएँ होती रहती थीं ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां यमलार्जुनभङ्गो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें यमलार्जुनभङ्गविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥


अष्टमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण-बलरामकी बालचर्या, श्रीकृष्णके द्वारा व्रजको अन्यत्र ले जानेकी चेष्टा और अपने शरीरसे भेड़ियोंको उत्पन्न करके उनका समूचे व्रजको डराना

वैशम्पायन उवाच
एवं तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ।
तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार श्रीकृष्ण और संकर्षण दोनों भाई उसी व्रजमें बाल्यावस्थाको पार करके सात वर्षके हो गये ॥ १ ॥

नीलपीताम्बरधरौ पीतश्वेतानुलेपनौ ।
बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षाधरावुभौ ॥ २ ॥

इनमेंसे एक (बलराम) तो नील वस्त्र धारण करते थे और दूसरे (श्रीकृष्ण) पीत वस्त्र । दोनोंके चन्दन और अङ्गराग भी क्रमशः पीले और श्वेत थे । दोनों ही काकपक्ष धारण करते थे। अब वे दोनों भाई बछड़े चराने लगे ॥ २ ॥

पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ ।
शुशुभाते वनगतौ त्रिशीर्षाविव पन्नगौ ॥ ३ ॥

उन दोनोंके मुख बड़े सुन्दर थे। वे वनमें जाकर कानोंको सुख देनेवाले पत्तोंके बाजे (पिपीहरी या सीटी)* बजाते हुए तीन सिरवाले सर्पोंके समान शोभा पाते थे* ॥ ३ ॥

मयूराङ्गदकर्णौ तु पल्लवापीडधारिणौ ।
वनमालाकुलोरस्कौ द्रुमपोताविवोद्गतौ ॥ ४ ॥

मोरपङ्खके ही बाजूबंद और कर्णभूषण पहने तथा पत्तोंके ही मुकुट धारण किये वे दोनों भाई वृक्षके निकले


* ताड़ आदिके पत्तेको मोड़कर उसके सिरेपर छोटा-सा छेद रखकर उसे दोनों हाथसे पकड़े हुए बच्चे मुँहमें डालकर फूँकते हैं, उसमेंसे सीटी, बिगुल या बाँसुरी-जैसी आवाज निकलती है। उसे बजाते समय दोनों हाथ और सिर ऊँचाईपर रहते हैं। इसीकी सर्पके तीन सिरोंसे उपमा दी गयी है।

B. K. Mitra

श्रीकृष्ण और बलरामका वन-विहार (पृष्ठ-संख्या २३४)