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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 67

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १४ ॥ २९
(विरिष्टं स्यात्) दोष होवे (तत्र अग्नीन् उपसमाधाय) वहां अग्नियों को ठीक
करके (शान्त्युदकं कृत्वा) शान्ति जल [शंनो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं
योरभिस्रवन्तु नः (अथर्व० १ । ६ । १) इस मन्त्र के साथ आचमन आदि के लिए
शान्ति जल] करके ('पृथिव्यै श्रोत्रायेति) पृथिव्यै श्रोत्राय० इत्यादि [अथर्व० ६ ।
१० । १ मन्त्र से] (त्रिः एव) तीन बार ही (अग्नीन्) अग्नियों को (सम्प्रोक्षति)
[घृत से] भली प्रकार सींचे (त्रिः) तीन बार (पर्युक्षति) सब ओर से सींचे, (च)
और (कारयमाणम्) कर्म कराने वाले को (आचामयति) आचमन करावे (च)
और (सम्प्रोक्षति) [जल से] भले प्रकार सींचे, (च) और (यज्ञवास्तु) यज्ञशाला
को (सम्प्रोक्षति) भले प्रकार सींचे । (अथ अपि) तब ही (वेदानां रसेन) वेदों
के रस [ध्वनि] से (यज्ञस्य विरिष्टम्) यज्ञ का दोष (सन्धीयते) सुधर जाता है ।
(तत् यथा) सो जैसे (लवणेन) लवण [खार] के साथ, (सुवर्णं सुवर्णेन) सोने
को सोने से, (रजतं रजतेन) चांदी को चांदी से, (लोहं लोहेन) लोहे को लोहे से
(सीसं सीसेन) सीसा [धातु विशेष] को सीसे से (सन्दध्यात्) जोड़े, (एषु)
इन [कर्मों में] (एवम् एव) ऐसे ही (अस्य यज्ञस्य विरिष्टम्) इस यज्ञ का दोष
(सन्धीयते) सुधर जाता है। (यज्ञस्य सन्धितिम् अनु) यज्ञ के सुधार के साथ
(यजमानः सन्धीयते) यजमान सुधर जाता है । (यजमानस्य सन्धितिम् अनु)
यजमान के सुधार के साथ (ऋत्विजः सन्धीयन्ते) ऋत्विज सुधर जाते हैं।
(ऋत्विजां सन्धितिम् अनु) ऋत्विजों के सुधार के साथ (दक्षिणाः सन्धीयन्ते)
दक्षिणायें सुधर जाती हैं। (दक्षिणानां सन्धितिम् अनु) दक्षिणाओं के सुधार के साथ
(यजमानः) यजमान (पुत्रपशुभिः सन्धीयते) पुत्रों और पशुओं सहित सुधर जाता
है। (पुत्रपशूनां सन्धितिम् अनु) पुत्रों और पशुओं के सुधार के साथ (यजमानः)
यजमान (स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते) स्वर्ग लोक के साथ सुधर जाता है। (स्वर्गस्य
लोकस्य सन्धितिम् अनु) स्वर्ग लोक के सुधार के साथ (तस्य) उस [यजमान] को
(ऋद्धस्य) ऋद्धि [सम्पत्ति] का (योगक्षेमः) योगक्षेम [पाने योग्य का पाना और
पाये हुये का बचाना] (सन्धीयते) सुधर जाता है, (यस्मिन् ऋद्धे) जिस सम्पत्ति में
(यजन्ते) वे यज्ञ करते हैं, (इति ब्राह्मणम्) यह ब्राह्मण [वेद ज्ञान] है ॥ १४ ॥
उपनाम्नि (एरन्) ईर गतौ—लुङ्, आर्षरूपं लोडर्थे। ऐरयन्। प्रेरयन्तु (उप-
समाधाय) यथाविधि समाहितान् कृत्वा (त्रिः) द्वित्रिचतुर्भ्यः सुच् (पा० ५ ।
४ । १८) त्रि—सुच् । त्रिवारम् (सम्प्रोक्षति) उक्ष सेचने । घृतेन यथाविधि
सिंचति (कारयमाणम्) कारयतेः—शानच् । कर्मकारयितारम् (रसेन)
रस शब्दे आस्वादने च—अच् । रसा नदी रमतेः शब्दकर्मणः—निरु०
११ । २५ । रसो वाङ्नाम—निघ० १ । ११ । रसनेन ध्वनिना (लवणेन) लूञ्
छेदने—ल्युट् । क्षारविशेषेण (सन्दध्यात्) संयोजयेत् (सन्धितिम्) सुधितवसुधि-
तनेमधितधिष्वधिषीय च (पा० ७ । ४ । ४५) अत्र 'क्तिन्यपि दृश्यते" इति उक्तत्वात्
सम्+दधातेः—क्तिन्, इत्त्वं च । संहितिम्। संयोगम् । मेलनम् ।