गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context३० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १५ ॥
भावार्थः—जहां ऋत्विज् लोग विद्वान् क्रियाकुशल होते हैं, वहां यज्ञ की समाप्ति
उत्तमता से होती है और सब यजमान तथा ऋत्विजों के आनन्द और सम्पत्ति
बढ़ते हैं ॥ १४ ॥
कण्डिका १५ ॥
तदुह स्माहाथर्वा देवो विजानन्यज्ञविरिष्टानन्दानित्युपशमयेरन् यज्ञे
प्रायश्चित्तिः क्रियतेऽपि च यदु बह्विव यज्ञे विलोमः क्रियते न चैवास्य काचनार्त्ति-
र्भवति न च यज्ञविष्कन्धमुपयात्यपहन्ति पुनर्मृत्युमपात्येति पुनराजातिं कामचारो-
ऽस्य सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद यश्चैवं विद्वान् ब्रह्मा भवति यस्य चैवं विद्वान्
ब्रह्मा दक्षिणतः सदोऽध्यास्ते यस्य चैवं विद्वान् ब्रह्मा दक्षिणत उदङ्मुख आसीनो
यज्ञ आज्याहुतीर्जुहोतीति ब्राह्मणम् ॥ १५ ॥
कण्डिका १५ ॥ यज्ञ की सफलता का लाभ ॥
(तत् उ ह स्म) यह ही निश्चय करके (विजानन्) विज्ञानी, (देवः)
देव [ प्रकाशमान वा विजयी ] (अथर्वा) अथर्वा [ निश्चल ब्रह्म ] (आह)
कहता है (यज्ञविरिष्टानन्दानि) यज्ञ के दोषों के विघ्नों को (उपशमयेरन् इति)
शान्त करें। [इस लिये] (यज्ञे) यज्ञ में (प्रायश्चित्तिः) प्रायश्चित्त [पाप दूर करने
के लिये तप आदि कर्म ] (क्रियते) किया जाता है, (अपि च) और भी (यत् उ
बहु इव) जो कुछ बहुत सा (विलोमः) उलट पुलट (क्रियते) किया जाता है,
(अस्य च) उसकी भी (एव) निश्चय करके (काचन आर्त्तिः) कोई भी पीड़ा
(न भवति) नहीं होती (च न) और न (यज्ञविष्कन्धम्) यज्ञ के पतन को
(उपयाति) वह पाता है। (पुनः मृत्युम् अपहन्ति) फिर वह मृत्यु को हटा देता
है, (पुनः आजातिम् अपात्येति) और फिर वह अल्प जीवन को लांघ जाता है [दीर्घ
आयु कर लेता है]। (अस्य) उस [मनुष्य] का (कामचारः) अपनी इच्छा से
विचरना (सर्वेषु लोकेषु) सब लोकों में (भाति प्रकाशित होता है, (यः) जो
(एवम्) ऐसा (वेद) जानता है, (च यः) और जो (एवम्) ऐसा (विद्वान्)
जानने वाला (ब्रह्मा) ब्रह्मा [सब वेद जानने वाला यज्ञनायक] (भवति) होता है,
(यस्य च) और जिस [मनुष्य] का (एवं विद्वान्) ऐसा जानने वाला (ब्रह्मा)
ब्रह्मा (दक्षिणतः) दाहिनी ओर को (सदः अध्यास्ते) शाला में बैठता है, (यस्य च)
१५—(यज्ञविरिष्टानन्दानि) यज्ञविरिष्ट+नञ्+तुनदि समृद्धौ संतोषे च—
अच्। यज्ञस्य दोषाणाम् अनन्दानि विघ्नान् (उपशमयेरन्) शान्तानि कुर्वन्तु
(प्रायश्चित्तिम्) प्रायस्य चित्तिचित्तयोः (वा० पा० ६।१।१५७) प्राय+चिती
सञ्ज्ञाने—क्तिन्, सुडागमः। प्रायः पापं विजानीयाच्चित्तं तस्य विशोधनम्। पाप-
क्षयसाधन तप आदिकम् (विलोमः) विपरीतव्यवहारः (आर्त्तिः) आङ्+ऋ
हिंसाने गतो च—क्तिन्। पीडा (यज्ञविष्कन्धम्) यज्ञ+वि+ष्कन्द शोषणे गत्यां
च—घञ्, षश्चान्तादेशः। यज्ञस्य शोषणं पतनम् (उपयाति) प्राप्नोति यजमानः।