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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

About this granth

Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.

The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.

Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.

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५६८ * गीता-संग्रह *


निष्कर्मकर्मदहनो ज्वलनो भवामि
निर्दुःखदुःखदहनो ज्वलनो भवामि।
निर्देहदेहदहनो ज्वलनो भवामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ९ ॥

मैं कर्मरहित हूँ और कर्मोंको जलानेहेतु अग्निरूप हूँ; मैं दुःखरहित हूँ और दुःखोंको जलानेके लिये अग्निरूप हूँ; मैं देहरहित हूँ और देहाभिमानको जलानेके लिये अग्निरूप हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ९॥

निष्पापपापदहनो हि हुताशनोऽहं
निर्धर्मधर्मदहनो हि हुताशनोऽहम्।
निर्बन्धबन्धदहनो हि हुताशनोऽहं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १० ॥

मैं पापसे रहित हूँ, फिर भी पापको दग्ध करनेके लिये अग्निरूप हूँ, मैं धर्मरहित हूँ फिर भी धर्मका दाह करनेहेतु अग्निरूप हूँ और मैं बन्धनरहित हूँ फिर भी बन्धनको जलानेके लिये अग्निरूप हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १०॥

निर्भावभावरहितो न भवामि वत्स
निर्योगयोगरहितो न भवामि वत्स।
निश्चित्तचित्तरहितो न भवामि वत्स
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ११ ॥

हे वत्स! मैं भावरहित होकर भी भावरहित नहीं हूँ, मैं योगरहित होकर भी योगरहित नहीं हूँ और चित्तसे रहित होकर भी चित्तरहित नहीं हूँ। (अर्थात मैं इनसे युक्त भी और इनसे रहित भी हूँ)। हे वत्स! मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ११॥

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* अवधूतगीता ( १ )* ५६९


निर्मोहमोहपदवीति न मे विकल्पो
निःशोकशोकपदवीति न मे विकल्पः।
निर्लोभलोभपदवीति न मे विकल्पो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १२ ॥

मोहशून्य अथवा मोहयुक्त—इस प्रकारका विकल्प मुझमें नहीं है, शोकरहित अथवा शोकयुक्त—इस प्रकारका भी विकल्प मुझमें नहीं है और लोभरहित अथवा लोभयुक्त—इस प्रकारका भी विकल्प मुझमें नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १२॥

संसारसन्ततिलता न च मे कदाचित्
सन्तोषसन्ततिसुखं न च मे कदाचित्।
अज्ञानबन्धनमिदं न च मे कदाचित्
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १३ ॥

संसाररूपी प्रवाहकी निरन्तरता मुझमें कभी नहीं है, सन्तोषरूपी प्रवाहका सुख भी मुझमें कभी नहीं है और यह अज्ञानबन्धन मुझमें किंचित् भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १३॥

संसारसन्ततिरजो न च मे विकारः
सन्तापसन्ततितमो न च मे विकारः।
सत्त्वं स्वधर्मजनकं न च मे विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १४ ॥

संसाररूपी प्रवाहका रजोगुण मुझे विकृत नहीं करता, संसार-परम्पराका तम (अज्ञान) भी मुझे विकृत नहीं करता और अपने धर्मका जनक सत्त्वगुण भी मुझे प्रभावित नहीं करता। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १४॥

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५७० * गीता-संग्रह *


सन्तापदुःखजनको न विधिः कदाचित्
सन्तापयोगजनितं न मनः कदाचित्।
यस्मादहङ्कृतिरियं न च मे कदाचि-
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १५॥

सन्ताप तथा दुःखको उत्पन्न करनेवाली जो विधि है, वह मेरे लिये कभी नहीं है, सन्तापके सम्बन्धसे उत्पन्न जो संकल्परूप मन है, वह भी मेरा कभी नहीं है और जो यह अहंकार है, वह भी मुझमें कभी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १५॥

निष्कम्पकम्पनिधनं न विकल्पकल्पं
स्वप्नप्रबोधनिधनं न हिताहितं हि।
निःसारसारनिधनं न चराचरं हि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १६॥

मैं कम्परहित और कम्पयुक्त दोनोंका नाशरूप नहीं हूँ, मैं विकल्प तथा कल्परूप भी नहीं हूँ, मैं स्वप्न और जाग्रत्का नाशरूप भी नहीं हूँ, मैं हित तथा अहितरूप भी नहीं हूँ, मैं निःसार तथा सारका नाशरूप नहीं हूँ और मैं चर और अचररूप भी नहीं हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १६॥

नो वेद्यवेदकमिदं न च हेतुतर्क्यं
वाचामगोचरमिदं न मनो न बुद्धिः।
एवं कथं हि भवतः कथयामि तत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १७॥

यह आत्मस्वरूप चेतन ब्रह्म न ज्ञानका विषय है और न जाननेवाला ही है, यह वाणीसे अगम्य है, इसे न मन जान सकता है और न बुद्धि ही जान सकती है; इस प्रकारके आत्मतत्त्वका वर्णन मैं

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  • अवधूतगीता (१) * ५७१

आपके समक्ष कैसे करूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १७॥

निर्भिन्नभिन्नरहितं परमार्थतत्त्व-
मन्तर्बहिर्न हि कथं परमार्थतत्त्वम्।
प्राक्सम्भवं न च रतं नहि वस्तु किञ्चि-
ज्ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १८॥

यह परमतत्त्व भेदाभेदसे रहित और भीतर तथा बाहरके व्यवहारसे शून्य है, पूर्वमें यह कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ, यह किसी भी पदार्थसे लिप्त नहीं है और यह कोई वस्तु भी नहीं है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १८॥

रागादिदोषरहितं त्वहमेव तत्त्वं
दैवादिदोषरहितं त्वहमेव तत्त्वम्।
संसारशोकरहितं त्वहमेव तत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १९॥

मैं राग आदि दोषोंसे रहित आत्मतत्त्व हूँ, मैं दैव आदि दोषोंसे रहित आत्मतत्त्व हूँ और मैं सांसारिक दुःखोंसे रहित आत्मतत्त्व हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १९॥

स्थानत्रयं यदि च नेति कथं तुरीयं
कालत्रयं यदि च नेति कथं दिशश्च।
शान्तं पदं हि परमं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २०॥

चेतन ब्रह्ममें यदि तीन अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) नहीं हैं तो चौथी तुरीयावस्था कैसे हो सकती है? यदि उसमें तीनों काल नहीं हैं तो दिशाएँ कैसे हो सकती हैं? वह ब्रह्म शान्तपद, अतिश्रेष्ठ

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५७२ * गीता-संग्रह *

तथा परमार्थतत्त्वस्वरूप है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ,
समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२०॥

दीर्घो लघुः पुनरितीह न मे विभागो
विस्तारसङ्कटमितीह न मे विभागः।
कोणं हि वर्तुलमितीह न मे विभागो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२१॥

यह दीर्घ है और यह लघु है—इस प्रकारका भेद इसी लोकमें
है, मुझमें नहीं है, विस्तार और संकोच—ऐसा विभाग भी इस लोकमें
है, मुझमें नहीं है और कोण तथा गोलाकार—ऐसा विभाग भी इसी
संसारमें है, मुझमें नहीं है; मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और
आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२१॥

मातापितादि तनयादि न मे कदाचि-
ज्जातं मृतं न च मनो न च मे कदाचित्।
निर्व्याकुलं स्थिरमिदं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२२॥

मेरे माता, पिता, पुत्र आदि न तो कभी उत्पन्न हुए और न मृत्युको
ही प्राप्त हुए, मेरा मन कभी व्याकुलतासे रहित तथा स्थिर भी नहीं है।
[एकमात्र] यह आत्मा ही परमार्थतत्त्वस्वरूप है; मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ,
समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२२॥

शुद्धं विशुद्धमविचारमनन्तरूपं
निर्लेपलेपमविचारमनन्तरूपम् ।
निष्खण्डखण्डमविचारमनन्तरूपं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२३॥

यह चेतन आत्मा शुद्ध है, अति शुद्ध है, विचाररहित और
अनन्तरूप है। यह निर्लेप होकर भी सम्बन्धयुक्त है, विचारसे परे

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* अवधूतगीता ( १ ) * ५७३

और अनन्तरूप है। यह नाशसे रहित और नाशवान्, अचिन्त्य तथा अनन्तरूप है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २३ ॥

ब्रह्मादयः सुरगणाः कथमत्र सन्ति
स्वर्गादयो वसतयः कथमत्र सन्ति।
यद्येकरूपममलं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २४ ॥

जब यह आत्मतत्त्व एकरूप, विशुद्ध तथा परमार्थस्वरूप है, तब ब्रह्मा आदि देववृन्द इसमें कैसे हो सकते हैं और स्वर्ग आदि स्थान भी इसमें कैसे हो सकते हैं? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २४ ॥

निर्नेति नेति विमलो हि कथं वदामि
निःशेषशेषविमलो हि कथं वदामि।
निर्लिङ्गलिङ्गविमलो हि कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २५ ॥

यह आत्मतत्त्व नेति और इतिसे परे है, यह सम्पूर्ण और शेषसे भी परे है तथा यह आकार और निराकारसे भी परे है। इसे मैं कैसे अभिव्यक्त करूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २५ ॥

निष्कर्मकर्मपरमं सततं करोमि
निःसङ्गसङ्गरहितं परमं विनोदम्।
निर्देहदेहरहितं सततं विनोदं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २६ ॥

आत्मस्वरूप मैं कर्मसे रहित होकर भी सदा महत्कर्म करता रहता हूँ, मैं निःसंग होकर भी परमलीलाका आनन्द लेता हूँ,

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५७४ * गीता-संग्रह *


देहरहित और निराकार होकर मैं निरन्तर विनोदका रस लेता हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २६॥

मायाप्रपञ्चरचना न च मे विकारः
कौटिल्यदम्भरचना न च मे विकारः।
सत्यानृतेति रचना न च मे विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २७॥

माया-प्रपंचकी रचना मेरा विकार नहीं है, कुटिलता तथा दम्भकी रचना भी मेरा विकार नहीं है और सत्य तथा मिथ्याकी रचना भी मेरा विकार नहीं है; मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २७॥

सन्ध्यादिकालरहितं न च मे वियोगो
ह्यन्तःप्रबोधरहितं बधिरो न मूकः।
एवं विकल्परहितं न च भावशुद्धं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २८॥

मैं सन्ध्या, मध्याह्न आदि कालोंसे रहित हूँ, किसीके साथ मेरा वियोग नहीं है; मैं अन्तःकरणके ज्ञानसे रहित हूँ, किंतु बधिर और मूक नहीं हूँ। इस प्रकार मैं विकल्पोंसे रहित हूँ (इसलिये अन्तःकरणके अभावमें) मुझमें भाव-शुद्धि भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २८॥

निर्नाथनाथरहितं हि निराकुलं वै
निश्चिन्तचित्तविगतं हि निराकुलं वै।
संविद्धि सर्वविगतं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २९॥

मैं स्वामीसे रहित हूँ और मैं भी किसीका स्वामी नहीं हूँ। मैं

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५७५

व्याकुलतासे रहित हूँ। मैं चिन्तासे रहित हूँ और चित्तसे भी रहित हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, तुम मुझे सर्वसे रहित तथा आकुलतारहित जानो। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २९ ॥

कान्तारमन्दिरमिदं हि कथं वदामि
संसिद्धसंशयमिदं हि कथं वदामि।
एवं निरन्तरसमं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३० ॥

यह जगत् निर्जन वनस्थली है, यह मैं कैसे कहूँ; यह वास्तवमें है या इसमें संशय है—ऐसा भी मैं किस प्रकार कहूँ? इसी प्रकार यह निरन्तर सम है तथा निराकुल है—ऐसा भी मैं किस प्रकार कहूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३० ॥

निर्जीवजीवरहितं सततं विभाति
निर्बीजबीजरहितं सततं विभाति।
निर्वाणबन्धरहितं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३१ ॥

(मुझे यह संसार) निर्जीव (जड़) और जीव (चेतन) सभीसे सदा रहित ही प्रतीत होता है, निर्बीज और सबीज (पदार्थों)-से सदा रहित प्रतीत होता है और निर्वाण तथा बन्धनसे भी सदा रहित प्रतीत होता है (क्योंकि यह मायामात्र है)। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३१ ॥

सम्भूतिवर्जितमिदं सततं विभाति
संसारवर्जितमिदं सततं विभाति।
संहारवर्जितमिदं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३२ ॥

यह परमतत्त्व मुझे निरन्तर उत्पत्तिसे रहित प्रतीत होता है, यह

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५७६ * गीता-संग्रह *


मुझे निरन्तर नाशसे रहित भी प्रतीत होता है और यह मुझे निरन्तर संसारसे रहित प्रतीत होता है, [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥३२॥

उल्लेखमात्रमपि ते न च नामरूपं
निर्भिन्नभिन्नमपि ते न हि वस्तु किञ्चित्।
निर्लज्जमानस करोषि कथं विषादं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३३॥

किंचिन्मात्र भी तुम्हारा नाम तथा रूप नहीं है, तुम्हारे भेदरहित स्वरूपमें भेद उत्पन्न करनेवाली कोई भी वस्तु नहीं है; तब हे निर्लज्ज मन! तुम क्यों विषाद करते हो, [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३३॥

किं नाम रोदिषि सखे न जरा न मृत्युः
किं नाम रोदिषि सखे न च जन्मदुःखम्।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३४॥

हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें न तो जरा और न तो मृत्यु ही व्याप्त कर सकती है। हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें तो जन्मका दुःख भी नहीं हो सकता है। हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें कोई विकार नहीं हो सकता। [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३४॥

किं नाम रोदिषि सखे न च ते स्वरूपं
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विरूपम्।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३५॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, (यह शरीर) तुम्हारा

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५७७

[वास्तविक] स्वरूप नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते
हो, तुम्हारा रूप नष्ट होनेवाला नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये
रुदन करते हो, आयु आदि भी तुम्हारे नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत
हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३५ ॥

किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि
किं नाम रोदिषि सखे न च ते मनांसि।
किं नाम रोदिषि सखे न तवेन्द्रियाणि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३६॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, आयु आदि तुम्हारे नहीं
हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, मन आदि भी तुम्हारे
नहीं हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, इन्द्रियाँ भी तुम्हारी
नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान
[व्यापक] हूँ॥ ३६ ॥

किं नाम रोदिषि सखे न च तेऽस्ति कामः
किं नाम रोदिषि सखे न च ते प्रलोभः।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विमोहो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३७॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें
कामना नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे
अन्तःकरणमें लोभ नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो,
तुम्हारे अन्तःकरणमें मोह नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ
तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३७॥

ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते धनानि
ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते हि पत्नी।

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५७८ * गीता-संग्रह *


ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते ममेति
  ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३८ ॥

[हे तात!] जब धन आदि तुम्हारे नहीं हैं, तब तुम ऐश्वर्यकी इच्छा किसलिये करते हो; जब पत्नी भी वस्तुतः तुम्हारी नहीं है, तब तुम ऐश्वर्यकी इच्छा क्यों करते हो; जब ममत्व ही तुम्हारा नहीं रहा, तब तुम ऐश्वर्यकी इच्छा क्यों करते हो? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ ३८ ॥

लिङ्गप्रपञ्चजनुषी न च ते न मे च
  निर्लज्जमानसमिदं च विभाति भिन्नम्।
निर्भेदभेदरहितं न च ते न मे च
  ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३९ ॥

[नाना प्रकारके पशु, पक्षी, मनुष्य आदि] चिह्नस्वरूप प्रपंचकी उत्पत्ति न तुम्हारे है और न मेरे है; यह सम्पूर्ण रचना निर्लज्ज मनको [भ्रान्तिवश] भिन्न होकर प्रतीत होती है। अभेद और भेदसे रहित होना भी तुम्हारा नहीं है और मेरा भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ ३९ ॥

नो वाणुमात्रमपि ते हि विरागरूपं
  नो वाणुमात्रमपि ते हि सरागरूपम्।
नो वाणुमात्रमपि ते हि सकामरूपं
  ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४० ॥

तुम्हारा स्वरूप अणुमात्र भी रागसे रहित नहीं है और तुम्हारा स्वरूप अणुमात्र भी रागयुक्त नहीं है; उसी प्रकार तुम्हारा स्वरूप अणुमात्र भी कामनायुक्त नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ ४० ॥

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  • अवधूतगीता (१) * ५७९

ध्याता न ते हि हृदये न च ते समाधि-
र्ध्यानं न ते हि हृदये न बहिः प्रदेशः।
ध्येयं न चेति हृदये न हि वस्तु कालो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४१ ॥

तुम्हारे हृदयमें न कोई ध्यान करनेवाला है, न कोई समाधि है, न कोई ध्यान है और न कोई बाह्य प्रदेश ही है; इसी प्रकार तुम्हारे हृदयमें न कोई ध्येय है, न कोई वस्तु है और न काल ही है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ४१ ॥

यत्सारभूतमखिलं कथितं मया ते
न त्वं न मे न महतो न गुरुर्न शिष्यः।
स्वच्छन्दरूपसहजं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४२ ॥

जो कुछ भी सारभूत था, वह सब मैंने तुमसे कह दिया। वास्तवमें न तुम हो, न मैं हूँ, न कोई पूज्य है, न कोई गुरु है और न कोई शिष्य है। मैं सहज, परमस्वतन्त्र तथा परमार्थस्वरूप हूँ। [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ [तुम भी वही हो] ॥ ४२ ॥

कथमिह परमार्थं तत्त्वमानन्दरूपं
कथमिह परमार्थं नैवमानन्दरूपम्।
कथमिह परमार्थं ज्ञानविज्ञानरूपं
यदि परमहमेकं वर्तते व्योमरूपम् ॥ ४३ ॥

जब मैं ही एकमात्र परमतत्त्व आकाशकी भाँति सर्वव्याप्त हूँ, तब मैं कैसे कहूँ कि यह परमार्थतत्त्व आनन्दस्वरूप है अथवा नहीं और यह ज्ञान अथवा विज्ञान (साधना)-से प्राप्य है अथवा नहीं॥ ४३ ॥

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५८० * गीता-संग्रह *


दहनपवनहीनं विद्धि विज्ञानमेक-
मवनिजलविहीनं विद्धि विज्ञानरूपम्।
समगमनविहीनं विद्धि विज्ञानमेकं
गगनमिव विशालं विद्धि विज्ञानमेकम्॥ ४४॥

[हे तात !] तुम विज्ञानस्वरूप आत्माको अग्नि तथा वायुसे रहित और एक समझो; उसी प्रकार इस विज्ञानस्वरूप आत्माको पृथ्वी तथा जलसे रहित समझो; इस विज्ञानस्वरूप आत्माको सतत गतिसे विहीन समझो और इस विज्ञानस्वरूप आत्माको आकाशकी भाँति विशाल तथा एक जानो॥ ४४॥

न शून्यरूपं न विशून्यरूपं
न शुद्धरूपं न विशुद्धरूपम्।
रूपं विरूपं न भवामि किञ्चित्
स्वरूपरूपं परमार्थतत्त्वम्॥ ४५॥

मैं न शून्यरूप हूँ तथा न अशून्यरूप हूँ; न शुद्धरूप हूँ और न अशुद्ध रूप हूँ; मैं रूप तथा विरूप कुछ भी नहीं हूँ। मैं स्वरूपमात्र हूँ और परमार्थतत्त्व हूँ॥ ४५॥

मुञ्च मुञ्च हि संसारं त्यागं मुञ्च हि सर्वथा।
त्यागात्यागविषं शुद्धममृतं सहजं ध्रुवम्॥ ४६॥

[हे तात !] तुम संसारका त्याग कर दो, त्याग कर दो; पुनः उस त्यागका भी सर्वथा त्याग कर दो; त्याग तथा अत्यागको विषरूप जानकर उन्हें छोड़ दो। तुम शुद्धस्वभाव, अमृतरूप, सहज तथा नित्य हो॥ ४६॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥

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* अवधूतगीता (१) * ५८१


चौथा अध्याय

आत्मज्ञानीकी सर्वत्र समदृष्टि तथा आत्मतत्त्वकी अकथनीयताकी विवेचना

अवधूत उवाच

नावाहनं नैव विसर्जनं वा
पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति।
ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति
समासमं चैव शिवार्चनं च॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले— [ चेतन ब्रह्म सर्वव्यापी है, अतः ] उस ब्रह्मके न तो आवाहनकी और न उसके विसर्जनकी ही कोई आवश्यकता है। पुष्प तथा पत्र आदि भी किसलिये अर्पण होते हैं। उसके ध्यान तथा मन्त्र भी किस प्रकार होते हैं अर्थात् उसकी कोई आवश्यकता नहीं। सभीमें समदृष्टि रखना ही कल्याणस्वरूप चेतन ब्रह्मका पूजन है ॥ १ ॥

न केवलं बन्धविबन्धमुक्तो
न केवलं शुद्धविशुद्धमुक्तः।
न केवलं योगवियोगमुक्तः
स वै विमुक्तो गगनोपमोऽहम्॥ २ ॥

मैं केवल आसक्ति-अनासक्ति, शुद्ध-अशुद्ध और योग-वियोगसे ही रहित नहीं हूँ, मैं तो आकाशकी भाँति (सर्वव्यापक) और सर्वथा मुक्त हूँ॥ २ ॥

सञ्जायते सर्वमिदं हि तथ्यं
सञ्जायते सर्वमिदं वितथ्यम्।
एवं विकल्पो मम नैव जातः
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ३ ॥

यह सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच सत्यरूपमें उत्पन्न होता है अथवा यह मिथ्या उत्पन्न होता है—इस प्रकारका विकल्प मुझे कभी उत्पन्न नहीं हुआ; क्योंकि मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ ३ ॥

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५८२ * गीता-संग्रह *


न साञ्जनं चैव निरञ्जनं वा
न चान्तरं वापि निरन्तरं वा।
अन्तर्विभिन्नं न हि मे विभाति
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ४॥

मैं न तो मायामलसे युक्त हूँ और न मायामलसे रहित ही हूँ, मैं न व्यवधान हूँ और न व्यवधानरहित हूँ। मुझे व्यवधान तथा भेदका भान नहीं होता है। मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ ४॥

अबोधबोधो मम नैव जातो
बोधस्वरूपं मम नैव जातम्।
निर्बोधबोधं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ५॥

अज्ञानका बोध मुझे कभी नहीं हुआ, मैं बोधस्वरूप हूँ—ऐसा ज्ञान भी मुझे कभी नहीं हुआ। मैं अपनेको ज्ञानसे रहित अथवा बोध-वाला किस प्रकार कहूँ; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ ५॥

न धर्मयुक्तो न च पापयुक्तो
न बन्धयुक्तो न च मोक्षयुक्तः।
युक्तं त्वयुक्तं न च मे विभाति
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ६॥

मैं धर्मयुक्त नहीं हूँ, पापयुक्त नहीं हूँ, बन्धनयुक्त नहीं हूँ और मोक्षयुक्त भी नहीं हूँ। मुझे युक्त तथा अयुक्तका भान नहीं होता है; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ ६॥

परापरं वा न च मे कदाचिन्
मध्यस्थभावो हि न चारिमित्रम्।

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* अवधूतगीता ( १ ) * ५८३


हिताहितं चापि कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥७॥

मुझमें न पर, न अपर और न तो मध्यस्थभाव ही हैं। मुझमें शत्रु तथा मित्रकी भी भावना नहीं है। मैं [किसीको] अपना हितकर अथवा अहितकर भी कैसे कहूँ, [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥७॥

नोपासको नैवमुपास्यरूपं
न चोपदेशो न च मे क्रिया च।
संवित्स्वरूपं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥८॥

मैं उपासक नहीं हूँ और उपास्यरूप भी नहीं हूँ। मुझमें न तो उपदेश है और न क्रिया है। मैं अपनेको शुद्धज्ञानस्वरूप भी किस प्रकार कह सकता हूँ; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥८॥

नो व्यापकं व्याप्यमिहास्ति किञ्चि-
न्न चालयं वापि निरालयं वा।
अशून्यशून्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥९॥

इस चेतन आत्मामें किंचिन्मात्र भी व्याप्य-व्यापकभाव नहीं है; इसमें आश्रयभाव अथवा अनाश्रयभाव भी नहीं है। मैं इसे शून्यरहित अथवा शून्य भी कैसे कहूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥९॥

न ग्राहको ग्राह्यकमेव किञ्चि-
न्न कारणं वा मम नैव कार्यम्।

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५८४ * गीता-संग्रह *


अचिन्त्यचिन्त्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१०॥

मेरा ग्राहक (ग्रहण करनेवाला) अथवा ग्राह्य (ग्रहण किये जाने योग्य) भी कोई नहीं है; मेरा न कोई कारण है और न तो कोई कार्य है। उस आत्मतत्त्वको मैं अचिन्त्य अथवा चिन्त्य भी कैसे कहूँ; [ब्रह्मस्वरूप] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥१०॥

न भेदकं वापि न चैव भेद्यं
न वेदकं वा मम नैव वेद्यम्।
गतागतं तात कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥११॥

मैं न तो भेद करता हूँ न मेरा भेद होता है, मैं न तो जाननेवाला हूँ न जाना ही जाता हूँ। हे मित्र, आने-जानेवाले (पदार्थों)-के विषय में मैं कैसे कहूँ ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप और विकाररहित हूँ॥ ११ ॥

न चास्ति देहो न च मे विदेहो
बुद्धिर्मनो मे न हि चेन्द्रियाणि।
रागो विरागश्च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१२॥

मैं न शरीरयुक्त हूँ और न शरीरसे रहित ही हूँ। बुद्धि, मन तथा इन्द्रियाँ भी मेरे नहीं हैं। किसीमें भी मेरा राग है अथवा विराग है—यह मैं किस प्रकार कहूँ, क्योंकि मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥ १२ ॥

उल्लेखमात्रं न हि भिन्नमुच्चै-
रुल्लेखमात्रं न तिरोहितं वै।
समासमं मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१३॥

जीव तथा ब्रह्मका भेद किंचिन्मात्र भी नहीं है; वह ब्रह्म

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  • अवधूतगीता (१) * ५८५

किंचिन्मात्र भी छिपा हुआ नहीं है। हे मित्र! मैं उसे सम अथवा विषम भी कैसे कह सकता हूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकारसे रहित हूँ॥ १३॥

जितेन्द्रियोऽहं त्वजितेन्द्रियो वा
न संयमो मे नियमो न जातः।
जयाजयौ मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १४॥

मैं जितेन्द्रिय हूँ अथवा अजितेन्द्रिय हूँ—यह कैसे कहूँ, (क्योंकि) मेरा कोई संयम अथवा नियम नहीं है। हे मित्र! मैं जय तथा पराजयका किस प्रकार कथन करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १४॥

अमूर्तमूर्तिर्न च मे कदाचि-
दाद्यन्तमध्यं न च मे कदाचित्।
बलाबलं मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १५॥

मैं कभी भी मूर्तिरहित अथवा मूर्तिमान् नहीं हूँ; मेरा कभी भी आदि, अन्त अथवा मध्य नहीं है। हे मित्र! मैं बलवान् तथा निर्बलका भी कथन किस प्रकार करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ १५॥

मृतामृतं वापि विषाविषं च
सञ्जायते तात न मे कदाचित्।
अशुद्धशुद्धं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १६॥

हे तात! मुझमें मरनेका, न मरनेका, विषका अथवा विषरहितका भाव कभी उत्पन्न नहीं होता है। मैं अशुद्ध अथवा शुद्धका भी कथन कैसे करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १६॥

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५८६ * गीता-संग्रह *


स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा
नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित्।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १७ ॥

मुझमें न स्वप्न है, न जाग्रत् है, न योगमुद्रा है, न रात है अथवा न दिन ही है; इसी प्रकार मैं तुरीय अथवा अतुरीय अवस्थाको भी किस प्रकार कहूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १७॥

संविद्धि मां सर्वविसर्वमुक्तं
माया विमाया न च मे कदाचित्।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १८ ॥

[हे तात!] तुम मुझको सब प्रकार सभी (प्रपंचों)-से मुक्त जानो; माया तथा विमाया भी मुझमें कभी उत्पन्न नहीं हुए। मैं सन्ध्या आदि कर्मका भी कथन किस प्रकार करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १८॥

संविद्धि मां सर्वसमाधियुक्तं
संविद्धि मां लक्ष्यविलक्ष्यमुक्तम्।
योगं वियोगं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १९ ॥

[हे तात!] तुम मुझको सम्पूर्ण समाधिसे युक्त जानो और मुझको लक्ष्यभाव तथा विलक्ष्यभावसे रहित जानो। मैं योग तथा वियोगको भी किस प्रकार कहूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १९॥

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५८७

मूर्खोऽपि नाहं न च पण्डितोऽहं
मौनं विमौनं न च मे कदाचित्।
तर्कं वितर्कञ्च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२०॥

मैं न तो मूर्ख हूँ और न पण्डित हूँ, मौन तथा वाचालका भाव भी मुझमें कभी नहीं हुआ। मैं तर्क और वितर्कका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥२०॥

पिता च माता च कुलं न जाति-
र्जन्मादि मृत्युर्न च मे कदाचित्।
स्नेहं विमोहं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२१॥

[ब्रह्मस्वरूप] मेरा न कोई पिता है, न माता है, न कुल है और न जाति है; मेरा जन्म आदि तथा मृत्यु कभी नहीं हुए। मैं स्नेह तथा वैराग्यका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥२१॥

अस्तं गतो नैव सदोदितोऽहं
तेजो वितेजो न च मे कदाचित्।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२२॥

मैं कभी भी लयभावको प्राप्त नहीं होता हूँ, अपितु सदा उदित रहता हूँ। तेज अथवा निस्तेज कभी भी मुझमें नहीं होता। मैं सन्ध्या आदि कर्मका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥२२॥

असंशयं विद्धि निराकुलं मा-
मसंशयं विद्धि निरन्तरं माम्।