गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* अवधूतगीता ( १ ) * ५८३
हिताहितं चापि कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥७॥
मुझमें न पर, न अपर और न तो मध्यस्थभाव ही हैं। मुझमें शत्रु तथा मित्रकी भी भावना नहीं है। मैं [किसीको] अपना हितकर अथवा अहितकर भी कैसे कहूँ, [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥७॥
नोपासको नैवमुपास्यरूपं
न चोपदेशो न च मे क्रिया च।
संवित्स्वरूपं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥८॥
मैं उपासक नहीं हूँ और उपास्यरूप भी नहीं हूँ। मुझमें न तो उपदेश है और न क्रिया है। मैं अपनेको शुद्धज्ञानस्वरूप भी किस प्रकार कह सकता हूँ; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥८॥
नो व्यापकं व्याप्यमिहास्ति किञ्चि-
न्न चालयं वापि निरालयं वा।
अशून्यशून्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥९॥
इस चेतन आत्मामें किंचिन्मात्र भी व्याप्य-व्यापकभाव नहीं है; इसमें आश्रयभाव अथवा अनाश्रयभाव भी नहीं है। मैं इसे शून्यरहित अथवा शून्य भी कैसे कहूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥९॥
न ग्राहको ग्राह्यकमेव किञ्चि-
न्न कारणं वा मम नैव कार्यम्।