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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 585

५८४ * गीता-संग्रह *


अचिन्त्यचिन्त्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१०॥

मेरा ग्राहक (ग्रहण करनेवाला) अथवा ग्राह्य (ग्रहण किये जाने योग्य) भी कोई नहीं है; मेरा न कोई कारण है और न तो कोई कार्य है। उस आत्मतत्त्वको मैं अचिन्त्य अथवा चिन्त्य भी कैसे कहूँ; [ब्रह्मस्वरूप] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥१०॥

न भेदकं वापि न चैव भेद्यं
न वेदकं वा मम नैव वेद्यम्।
गतागतं तात कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥११॥

मैं न तो भेद करता हूँ न मेरा भेद होता है, मैं न तो जाननेवाला हूँ न जाना ही जाता हूँ। हे मित्र, आने-जानेवाले (पदार्थों)-के विषय में मैं कैसे कहूँ ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप और विकाररहित हूँ॥ ११ ॥

न चास्ति देहो न च मे विदेहो
बुद्धिर्मनो मे न हि चेन्द्रियाणि।
रागो विरागश्च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१२॥

मैं न शरीरयुक्त हूँ और न शरीरसे रहित ही हूँ। बुद्धि, मन तथा इन्द्रियाँ भी मेरे नहीं हैं। किसीमें भी मेरा राग है अथवा विराग है—यह मैं किस प्रकार कहूँ, क्योंकि मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥ १२ ॥

उल्लेखमात्रं न हि भिन्नमुच्चै-
रुल्लेखमात्रं न तिरोहितं वै।
समासमं मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१३॥

जीव तथा ब्रह्मका भेद किंचिन्मात्र भी नहीं है; वह ब्रह्म