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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 603 of 675

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Page 603

६०२ * गीता-संग्रह *


गगनं पवनो न हि सत्यमिति
  धरणी दहनो न हि सत्यमिति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
  जलदश्च कथं सलिलं च कथम्॥९॥

आकाश तथा वायु सत्य नहीं हैं, पृथ्वी तथा अग्नि भी सत्य नहीं हैं। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर मेघ कैसे सत्य हो सकता है और जल कैसे सत्य हो सकता है?॥९॥

यदि कल्पितलोकनिराकरणं
  यदि कल्पितदेवनिराकरणम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
  गुणदोषविचारमतिश्च कथम्॥१०॥

यदि कल्पित लोकोंका उसमें निषेध है; यदि कल्पित देवताओंका उसमें निषेध है और यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर गुण तथा दोषके विचारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥१०॥

मरणामरणं हि निराकरणं
  करणाकरणं हि निराकरणम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
  गमनागमनं हि कथं वदति॥११॥

वह चेतन आत्मा मरण तथा अमरणसे रहित है; वह कर्तव्य तथा अकर्तव्यसे भी रहित है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें गमन तथा आगमनका भाव कैसे कहा जा सकता है?॥११॥