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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 604
  • अवधूतगीता (१) * ६०३

प्रकृतिः पुरुषो न हि भेद इति
न हि कारणकार्यविभेद इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
पुरुषापुरुषं च कथं वदति॥१२॥

‘प्रकृति और पुरुष’ का भेद वास्तवमें है ही नहीं; कारण तथा कार्यका भी भेद नहीं है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो यह पुरुष है तथा यह पुरुष नहीं है—यह कैसे कहा जा सकता है?॥१२॥

तृतीयं न हि दुःखसमागमनं
न गुणाद् द्वितीयस्य समागमनम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
स्थविरश्च युवा च शिशुश्च कथम्॥१३॥

दुःख (और सुखके द्वन्द्व)-से तीसरेकी उत्पत्ति नहीं होती, एक गुणसे दूसरे गुणकी उत्पत्ति नहीं होती। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप और कल्याणस्वरूप है तो वृद्ध, युवा और बालककी भिन्न स्थिति कैसे हो सकती है?॥१३॥

ननु आश्रमवर्णविहीनपरं
ननु कारणकर्तृविहीनपरम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनष्टविनष्टमतिश्च कथम्॥१४॥

वह आत्मा निश्चय ही आश्रम तथा वर्णसे रहित है; वह निश्चय ही कारण तथा कर्तासे भी रहित है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसके विषयमें नाश होने तथा नाश न होनेवाली बुद्धि कैसे हो सकती है?॥१४॥