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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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  • अवधूतगीता (१) * ६०१

भेदकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥५॥
यदि सारविसारविहीन इति
यदि शून्यविशून्यविहीन इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
प्रथमं च कथं चरमं च कथम्॥६॥
यदि वह चेतन आत्मा सार तथा असारसे रहित है; यदि वह शून्य तथा अशून्यसे रहित है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर उसमें आदि कैसे और अन्त कैसे हो सकता है?॥६॥

यदि भेदविभेदनिराकरणं
यदि वेदकवेद्यनिराकरणम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
तृतीयं च कथं तुरीयं च कथम्॥७॥
यदि वह चेतन आत्मा भेद तथा अभेदसे रहित है; यदि वह ज्ञाता तथा ज्ञेयके भेदसे रहित है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें तृतीय और चतुर्थ-अवस्था कैसे हो सकती है?॥७॥

गदितागदितं न हि सत्यमिति
विदिताविदितं न हि सत्यमिति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
विषयेन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम्॥८॥
कथित और अकथित व्यवहार सत्य नहीं है; ज्ञात और अज्ञात भी सत्य नहीं है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर विषय, इन्द्रिय, बुद्धि तथा मन उसमें कैसे हो सकते हैं?॥८॥