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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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६०० * गीता-संग्रह *


वह कार्य तथा कार्याभावसे रहित और परे है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो पूजन और तप किसलिये ? ॥ २ ॥

मन एव निरन्तरसर्वगतं
ह्यविशालविशालविहीनपरम् ।
मन एव निरन्तरसर्वशिवं
मनसापि कथं वचसा च कथम् ॥ ३ ॥

मन ही (आत्मरूपसे) निरन्तर और सर्वगत है; वह विस्तार तथा विस्तारके अभावसे रहित और परे है। मन ही निरन्तर, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है; उस परब्रह्मको मनके द्वारा कैसे जाना जा सकता है और वाणीके द्वारा उसका कथन कैसे किया जा सकता है ? ॥ ३ ॥

दिनरात्रिविभेदनिराकरण-
मुदितानुदितस्य निराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कथम् ॥ ४ ॥

उस चेतन आत्मामें दिन तथा रात्रिके भेदका निषेध है; उसमें सूर्य आदिके उदय होने अथवा उदय न होनेका भी निराकरण है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो ये सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप भिन्न कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४ ॥

गतकामविकामविभेद इति
गतचेष्टविचेष्टविभेद इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
बहिरन्तरभिन्नमतिश्च कथम् ॥ ५ ॥

उस चेतन आत्मामें कामना तथा कामनाके अभावका भेद नहीं है। उसमें चेष्टा तथा चेष्टाके अभावका भेद भी नहीं है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें बाहर और भीतरके

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