Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 600 of 675

Read in context
Page 600

* अवधूतगीता ( १ ) * ५९९


विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ ३२ ॥

पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं; वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है ॥ ३२ ॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


छठा अध्याय

आत्माके सर्वभेदातीतत्वका विचार तथा आत्मतत्त्वबोध

अवधूत उवाच

बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति वयं
वियदादिरिदं मृगतोयसमम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मुपमेयमथो ह्युपमा च कथम् ॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—अनेक श्रुतियाँ कहती हैं कि हम तथा आकाश आदि यह समस्त प्रपंच मृगतृष्णाके जलके समान है। यदि वह चेतन आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो यह उपमेय और उपमाका व्यवहार कैसे हो सकता है ? ॥ १ ॥

अविभक्तिविभक्तिविहीनपरं
ननु कार्यविकार्यविहीनपरम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
यजनं च कथं तपनं च कथम् ॥ २ ॥

वह चेतन आत्मा विभाग तथा अविभागसे विहीन और परे है;