गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 49 of 675
Read in context४८ * गीता-संग्रह *
एते दोषाः परित्याज्या योगाभ्यसनशालिना।
अनादरे हि चैतेषां स्मृतिलोपादयो ध्रुवम्॥ ११॥
योगाभ्यासीको ये सब दोषपूर्ण स्थान त्याग देने चाहिये, ऐसा न करनेसे अवश्य स्मृतिलोप आदि दोष होते हैं (अतः उपर्युक्त स्थानोंमें योगसाधन न करे) ॥११॥
नातिभुञ्जन् सदा योगी नाभुञ्जन्नातिनिद्रितः।
नातिजाग्रत्सिद्धिमेति भूप योगं सदाभ्यसन्॥ १२॥
हे राजन्! योगी सदा थोड़ा भोजन करे, बिना भोजन किये भी न रहे, न बहुत सोये, न बहुत जागे—इस प्रकार सदा योगाभ्यास करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो जाता है॥ १२॥
सङ्कल्पजांस्त्यजेत्कामान्नियताहारजागरः।
नियम्य खगणं बुद्ध्या विरमेत शनैः शनैः॥ १३॥
सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंका त्याग करे, थोड़ा भोजन करे, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इन्द्रियोंको वशमें करके शनैः-शनैः शान्तिको प्राप्त हो॥ १३॥
ततस्ततः कृषेदेतद्यत्र यत्रानुगच्छति।
धृत्यात्मवशगं कुर्याच्चित्तं चञ्चलमादृतः॥ १४॥
जिस-जिस स्थानमें मन जाय, उस-उस स्थानसे उसे खींचे और धैर्यसे उसे अपने वशमें करे, क्योंकि वह महाचंचल है॥ १४॥
एवं कुर्वन् सदा योगी परां निर्वृतिमृच्छति।
विश्वस्मिन्निजमात्मानं विश्वं च स्वात्मनीक्षते॥ १५॥
योगी सदा इस प्रकार करनेसे परम शान्तिको प्राप्त होता है और वह संसारमें अपनी आत्माको और अपनी आत्मामें संसारको देखता है॥ १५॥