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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 48 of 675

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Page 48

* गणेशगीता * ४७


समो जितात्मा विज्ञानी ज्ञानीन्द्रियजयावहः।
अभ्यसेत्सततं योगं यदा युक्ततमो हि सः॥ ६॥

मान, अपमान, सुख, दुःख, बन्धु, साधु, मित्र, अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मिट्टीके ढेले और सुवर्ण इत्यादिमें समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी, जितात्मा सदा योगका अभ्यास करता रहे, जबतक कि उसको योगकी सिद्धि न हो जाय ॥ ५-६ ॥

तप्तः श्रान्तो व्याकुलो वा क्षुधितो व्यग्रचित्तकः।
कालेऽतिशीतेऽत्युष्णे वानिलाग्न्यम्बुसमाकुले ॥ ७ ॥
सध्वनावतिजीर्णे गोः स्थाने साग्नौ जलान्तिके।
कूपकूले श्मशाने च नद्यां भित्तौ च मर्मरे ॥ ८ ॥
चैत्ये सवल्मिके देशे पिशाचादिसमावृते।
नाभ्यसेद्योगविद्योगं योगध्यानपरायणः ॥ ९ ॥

जो संतप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित अथवा व्यग्रचित्त हो, वह योगाभ्यास न करे। अतिशीतकाल अथवा अति उष्णकाल, अग्नि, वायु और जलकी अधिकतावाले देशमें, जिस स्थानमें ध्वनि अधिक हो, जो टूटा-फूटा हो, गोष्ठ, अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके निकट, श्मशान, नदी, दीवारके निकट तथा जहाँ शुष्क पर्णका शब्द सुनायी पड़ता हो, चैत्य वृक्षके नीचे, वल्मीक (बाँबी)-वाले स्थानमें और पिशाचादिसे युक्त स्थानमें योगध्यानपरायण योगी योगाभ्यास न करे ॥ ७—९ ॥

स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मन्दता ज्वरः।
जडता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः ॥ १० ॥

स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर, जड़ता—ये सब दोष अज्ञानसे योगीको होते हैं ॥ १० ॥