गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- गणेशगीता * ४९
योगेन यो मामुपैति तमुपैम्यहमादरात्।
मोचयामि न मुञ्चामि तमहं मां स न त्यजेत्॥ १६॥
योगसे जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरपूर्वक प्राप्त होता हूँ और जो मुझे नहीं छोड़ता है, उसको मैं नहीं छोड़ता हूँ तथा संसारसे मुक्त कर देता हूँ॥ १६॥
सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि।
आत्मसाम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः॥ १७॥
जीवन्मुक्तः स योगीन्द्रः केवलं मयि सङ्गतः।
ब्रह्मादीनां च देवानां स वन्द्यः स्याज्जगतत्रये॥ १८॥
सुख-दुःख, द्वेष, क्षुधा, सन्तोष और तृषा—इनमें जो आत्माके समान सब प्राणियोंको देखता है, जो मुझ सर्वव्यापीको जानता है और जो केवल मुझमें संलग्न है, वह जीवन्मुक्त है और वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादिक देवताओंद्वारा नमस्कार करनेयोग्य है॥ १७-१८॥
वरेण्य उवाच
द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसम्भाव्यो हि मे मतः।
यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो॥ १९॥
**वरेण्य बोले—**हे भगवन्! इन दोनों प्रकारके योगोंको मैं महाकठिन देखता हूँ, कारण कि मन बड़ा दुष्ट और चंचल है तथा इसका निग्रह करना कठिन है॥ १९॥
श्रीगजानन उवाच
यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः सम्प्रकल्पयेत्।
घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात्॥ २०॥
श्रीगणेशजी बोले—[हे राजन्!] जो निग्रह करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है॥ २०॥